कोलकाता, 16 जून।
पश्चिम बंगाल ने सियासी हवा बदल दी है। ‘मोदीफोबिया’ से ग्रसित राजनीतिक धारा के लिए वहां के नतीजे वज्रपात से कम नहीं हैं। दशकों से वोट बैंक के भरोसे चल रही राजनीति अब निष्प्रभावी दिख रही है। जमीन खिसकते देख क्षेत्रीय दल और कांग्रेस दोनों नई नाव तलाश रहे हैं। इसी बेचैनी में मर्जर की चर्चाएं गर्म हैं। कांग्रेस द्वारा ममता बनर्जी की टीएमसी और शरद पवार की पार्टी को विलय का ऑफर दिए जाने की चर्चा रही। कांग्रेस ने इसे अफवाह बताया, पर सियासत में धुआं बिना आग के नहीं उठता। प्रलय में सांप और नेवला भी एक नाव पर आ जाते हैं।
आज टीएमसी में भगदड़ है। विधायक दल टूट चुका है और विधानसभा में उसे अलग मान्यता भी मिल गई है। संसदीय दल के विभाजन पर लोकसभा अध्यक्ष का फैसला बाकी है। कानूनन मर्जर के लिए दो-तिहाई बहुमत चाहिए, जो ममता के पास अब बचा नहीं है। यानी मर्जर की बात व्यावहारिक कम और दबाव की राजनीति ज्यादा लगती है। कांग्रेस की नजर संगठन के साथ-साथ टीएमसी की संपत्तियों पर भी बताई जा रही है। विलय हुआ तो पूरी संपत्ति कांग्रेस के नियंत्रण में आ जाएगी। असल बीमारी वंशवाद है। ममता ने अभिषेक बनर्जी को वारिस बनाया, जबकि कांग्रेस में राहुल गांधी के नेतृत्व से असंतुष्ट होकर कई बड़े नेता पार्टी छोड़ चुके हैं।
सपा में अखिलेश और राजद में तेजस्वी विरासत संभालने की चुनौती से जूझ रहे हैं। नेतृत्व वंश से नहीं, क्षमता से आता है। इतिहास गवाह है कि अक्षम वारिसों के कारण सल्तनतें मिट्टी में मिल गईं। क्षेत्रीय दलों की पराजय से राजनीति दो-दलीय व्यवस्था की ओर बढ़ सकती है, लेकिन कांग्रेस का दोहरा चरित्र भी सवालों के घेरे में है। सबक साफ है कि जो दल परिवार को क्षमता पर तरजीह देंगे, उनका भविष्य संकट में पड़ सकता है। राजनीति वंश की जागीर नहीं, सेवा का संकल्प है। दो अक्षमताएं मिलकर सक्षमता नहीं बनतीं; पार्टी नीति और नीयत से बचती है, केवल ‘सियासी अभिषेक’ से नहीं।











