नई दिल्ली, 18 जून।
मौसम अब केवल मौसम विभाग की रिपोर्ट नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और करोड़ों लोगों की थाली से सीधा जुड़ा मुद्दा बन चुका है। जून-सितंबर 2026 के मानसून काल में अल-नीनो सक्रिय होने की आशंका ने सरकार को पहले से ही सतर्क कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप मानसून के महीनों पहले इतने बड़े स्तर पर ऐतिहासिक 'खेत बचाओ अभियान' शुरू करने का निर्णय लिया गया है और केंद्र सरकार ने राज्यों को पत्र लिखकर हर राज्य के लिए आकस्मिक योजना तैयार करने को कहा है। अल-नीनो एक मौसमी घटना है, जिसका सीधा संबंध प्रशांत महासागर के तापमान से है और जब मध्य व पूर्वी प्रशांत महासागर का सतही जल सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है, तो भारत समेत दक्षिण एशिया में मानसून कमजोर पड़ता है, जिसके कारण देश में औसत से 10 प्रतिशत तक कम बारिश होती है। जैसा कि पहले 2011-12, 2016-17 में सूखे जैसे हालात बने थे और 2014-15 में 13.85 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हुआ था, उसी खतरे को भांपते हुए अमेरिकी एजेंसी एनओएए द्वारा 2026 में अल-नीनो की 75 प्रतिशत संभावना जताए जाने के बाद कृषि मंत्रालय ने सभी राज्यों को 26 बिंदुओं वाला निर्देश जारी किया है ताकि जिला स्तर पर आकस्मिक फसल योजना बनाई जा सके।
इस महत्वाकांक्षी योजना के तीन मुख्य स्तंभ फसल विविवीकरण, सूक्ष्म सिंचाई और बीज बैंक हैं, जिसके तहत धान और मक्का जैसी ज्यादा पानी मांगने वाली फसलों की जगह पोषण से भरपूर मोटे अनाज जैसे बाजरा, ज्वार, रागी और कुटकी को बढ़ावा दिया जाएगा, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम पर 90 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जाएगी और हर ब्लॉक में सूखा-रोधी बीजों का भंडार रखा जाएगा ताकि बारिश देर से होने पर अल्प अवधि की किस्में तुरंत बोई जा सकें। केंद्रीय कृषि मंत्री के अनुसार यह योजना एक विन-विन समझौता है जिससे किसान की आय सुरक्षित होगी और देश की खाद्य सुरक्षा भी बनी रहेगी, क्योंकि इतिहास गवाह है कि जब 2014 और 2015 में लगातार दो साल सूखा पड़ा था और तैयारी देर से शुरू हुई थी, तब दलहन के दाम 200 रुपये किलो तक पहुंच गए थे, प्याज ने रुलाया था और कृषि विकास दर 1 प्रतिशत से नीचे आ गई थी, जिसे देखते हुए इस बार सरकार पहले से ही प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक कर रही है क्योंकि नीति आयोग के अनुसार हर 1 प्रतिशत कम मानसून सकल घरेलू उत्पाद को 0.35 प्रतिशत तक घटा देता है और 10 प्रतिशत कम बारिश का मतलब 3.5 लाख करोड़ रुपये का नुकसान है जिससे निपटने के लिए 50,000 करोड़ रुपये का क्लाइमेट रिस्क फंड बनाने का प्रस्ताव है।
हालांकि, इस योजना के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि अभी तक केवल 450 जिलों को ही इसमें शामिल किया गया है जबकि देश में 750 से अधिक कृषि जिले हैं और बिहार, झारखंड व ओडिशा जैसे राज्यों में जहाँ सिंचाई का रकबा 40 प्रतिशत से कम है वहाँ स्थिति सबसे नाजुक है, साथ ही पंजाब और हरियाणा में धान की खेती ने भूजल स्तर को 30 मीटर नीचे पहुंचा दिया है जिससे क्रॉप डायवर्सिफिकेशन अब कोई विकल्प नहीं बल्कि एक मजबूरी बन चुका है। 'खेत बचाओ अभियान' को पूरी तरह सफल और जन-अभियान बनाने के लिए यह आवश्यक है कि हर ग्राम पंचायत में क्लाइमेट चौपाल लगाकर किसानों को जागरूक किया जाए, मनरेगा को खेत तालाब, मेड़बंदी और चेक डैम के निर्माण से जोड़ा जाए, भारतीय मौसम विभाग के साथ निजी एजेंसियों को जोड़कर हर गांव तक तीन दिन का माइक्रो-फोरकास्ट पहुंचाया जाए, मोटे अनाज की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की गारंटी देकर मिलेट मिशन को सार्वजनिक वितरण प्रणाली से जोड़ा जाए और सूखे के समय चारे के संकट से निपटने के लिए हर ब्लॉक में फॉडर बैंक बनाकर पशुधन को बचाया जाए। अल-नीनो एक प्राकृतिक घटना है जिसे रोका नहीं जा सकता परंतु इसकी सटीक तैयारी की जा सकती है, इसलिए सरकार की यह आकस्मिक योजना एक बेहतरीन शुरुआत है लेकिन इसकी असली परीक्षा इसके जमीनी क्रियान्वयन में है क्योंकि फाइलों से निकलकर जब यह योजना खेत तक पहुंचेगी और केंद्र, राज्य, वैज्ञानिक व किसान एक टीम बनकर काम करेंगे, तभी देश इस इंद्रधनुषी क्रांति के माध्यम से सूखे से बच पाएगा, क्योंकि खेत बचेगा तभी भारत बचेगा और भारत बचेगा तभी दुनिया की खाद्य टोकरी भरी रहेगी।















