मऊगंज, 18 जून।
सुशासन की सबसे बड़ी परीक्षा तब होती है, जब व्यवस्था स्वयं अपना ऑडिटर बन जाए, परंतु मध्यप्रदेश के मऊगंज जिले में सीएम हेल्पलाइन 181 के साथ जो हुआ, वह इसी परीक्षा में पूरी तरह विफल होने की एक शर्मनाक कहानी है। यहाँ एक थाना प्रभारी ने खुद ही फर्जी शिकायतें दर्ज कराईं, खुद ही उनका मनगढंत निराकरण किया और गुडवर्क के नाम पर पुरस्कार की उम्मीद पाल ली, लेकिन अंततः जांच के बाद उन्हें निलंबन और लाइन अटैच का दंड भुगतना पड़ा। जांच में यह सनसनीखेज सच सामने आया है कि कुल 21 मोबाइल नंबरों का दुरुपयोग करके लगभग 250 संदिग्ध शिकायतें दर्ज कराई गईं और बाद में उन्हीं शिकायतों का कथित तौर पर संतोषजनक निराकरण दिखाकर उन्हें बंद भी कर दिया गया, यानी शिकायत भी अपनी और समाधान भी अपना। प्राकृतिक न्याय का शाश्वत सिद्धांत कहता है कि कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता, लेकिन इस पूरे प्रकरण में शिकायतकर्ता, जांचकर्ता और लाभार्थी स्वयं एक ही भ्रष्ट तंत्र बन गया। सीएम हेल्पलाइन का मुख्य उद्देश्य पीड़ित जनता को त्वरित व निष्पक्ष न्याय दिलाना है, लेकिन यदि इस जन-कल्याणकारी मंच को केवल कागजों पर अपना प्रदर्शन सुधारने का माध्यम बना दिया जाए, तो पूरी प्रशासनिक व्यवस्था से जनता का भरोसा उठ जाता है। इस नकली खेल के कारण उस असली शिकायतकर्ता की आवाज दब जाती है जो अपनी जमीन के विवाद या राशन न मिलने जैसी वास्तविक समस्याओं के लिए महीनों भटक रहा होता है।
इस गंभीर प्रशासनिक विकृति का समाधान बेहद स्पष्ट और व्यावहारिक है, जिसके तहत पहला नियम यह होना चाहिए कि जिस थाने के खिलाफ शिकायत दर्ज हो, उसका निराकरण कभी भी उसी थाने के अधिकारियों से न कराया जाए। इसके स्थान पर जिला स्तर पर एक पूरी तरह से स्वतंत्र जांच प्रकोष्ठ का गठन किया जाना चाहिए, जो हर महीने बंद हुई शिकायतों का यादृच्छिक (रैंडम) ऑडिट करे। किसी भी अधिकारी या थाने के प्रदर्शन का आकलन केवल बंद हुई शिकायतों की संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि शिकायतकर्ता की वास्तविक संतुष्टि और उसकी समस्या के स्थायी व जमीनी समाधान को आधार बनाकर किया जाना चाहिए। इस मामले में केवल एक थाना प्रभारी पर दंडात्मक कार्रवाई कर देना ही पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि जब तक 'गुडवर्क' का वास्तविक मतलब केवल फाइलों को बंद करना रहेगा, तब तक ऐसे फर्जीवाड़े भविष्य में भी बार-बार दोहराए जाते रहेंगे। सीएम हेल्पलाइन आम जनता की आखिरी उम्मीद है, इसलिए इसे केवल आंकड़ों को चमकाने वाली 'गुडवर्क फैक्ट्री' नहीं, बल्कि वास्तविक न्याय का एक सशक्त माध्यम बने रहना चाहिए। लोकतंत्र में किसी भी सरकार या व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार जनता का अटूट विश्वास होता है और सबसे बड़ा दंड उसी विश्वास का इस तरह से टूट जाना है, जिसे हर हाल में रोका जाना चाहिए।














