संपादकीय
18 Jun, 2026

यूरोप के हृदय से नई साझेदारी: स्लोवाकिया में भारत की कूटनीतिक दस्तक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्लोवाकिया यात्रा ने भारत और स्लोवाकिया के संबंधों को व्यापक साझेदारी के नए स्तर पर पहुंचाते हुए रक्षा, व्यापार, ऊर्जा, संस्कृति और वैश्विक सहयोग के कई नए द्वार खोल दिए हैं।

ब्रातिस्लावा, 18 जून।

कूटनीति में प्रतीकों का अपना विशेष महत्व होता है और जब कोई भारतीय प्रधानमंत्री पहली बार किसी देश की धरती पर कदम रखता है, तो वह केवल एक दौरा नहीं बल्कि इतिहास बन जाता है, जिसका जीवंत प्रमाण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्लोवाकिया दौरा है जो दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्तों को एक व्यापक साझेदारी में बदलने का ऐतिहासिक ऐलान है। 1993 में चेकोस्लोवाकिया के विभाजन के बाद बने इस देश से भारत के संबंध हमेशा सौहार्दपूर्ण रहे, परंतु वे एक सीमित दायरे में सिमटे हुए थे क्योंकि वर्ष 2025-26 में भी दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार करीब 650 मिलियन डॉलर का ही रहा जो कि इनकी वास्तविक क्षमता से बहुत कम है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की इस पहली ऐतिहासिक यात्रा ने उस पुराने कूटनीतिक दायरे को पूरी तरह से तोड़ दिया है। यूरोपीय संघ और नाटो के सदस्य स्लोवाकिया के साथ भारत ने अपने संबंधों को 'व्यापक साझेदारी' का सर्वोच्च दर्जा देने का निर्णय लिया है, जो आपसी विश्वास, प्राथमिकता और भविष्य का प्रतीक है तथा भारत के लिए मध्य यूरोप में एक नए प्रवेश द्वार की तरह काम करेगा जिसके अंतर्गत रक्षा, तकनीक, ऊर्जा और कनेक्टिविटी जैसे चार मुख्य स्तंभों पर साझा सहमति बनी है। इस पूरे दौरे की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के समर्थन में स्लोवाकिया की खुली घोषणा रही, जहां स्लोवाकिया के प्रधानमंत्री रॉबर्ट फिको ने सार्वजनिक रूप से कहा कि भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट का पूर्ण हकदार है और वैश्विक संस्थाओं को आज की हकीकत के अनुरूप सुधारा जाना चाहिए। यह बयान इसलिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि जी-4 (G-4) से बाहर का कोई यूरोपीय देश पहली बार इतने स्पष्ट शब्दों में भारत के पक्ष में आया है, जो भारत के 'ग्लोबल साउथ' नेतृत्व को वैश्विक स्तर पर मजबूती प्रदान करता है और चीन सहित अन्य स्थायी सदस्यों पर एक रणनीतिक दबाव बनाता है।

स्लोवाकिया के प्रधानमंत्री ने भारत की आर्थिक प्रगति, डिजिटल क्रांति, यूपीआई, डिजिटल इंडिया, को-विन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की अभूतपूर्व उपलब्धियों की जमकर सराहना करते हुए इन्हें अपने देश में भी अपनाने की इच्छा जताई है, वहीं रक्षा सहयोग इस नई साझेदारी का सबसे मजबूत स्तंभ बनकर उभरा है जिसके तहत दोनों देशों ने एक 'लेटर ऑफ इंटेंट' पर हस्ताक्षर किए हैं। स्लोवाकिया का रक्षा उद्योग छोटा परंतु तकनीकी रूप से बेहद उन्नत है जो बख्तरबंद गाड़ियों, तोप के गोलों और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम में विशेषज्ञता रखता है, इसलिए 'मेक इन इंडिया' के तहत संयुक्त उत्पादन की संभावनाएं तलाश कर स्लोवाकिया को यूरोप में भारत का रक्षा निर्माण केंद्र बनाया जा सकता है। इसके साथ ही पिछले आठ वर्षों से लंबित पड़े भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को अंतिम रूप देने में स्लोवाकिया ने पूर्ण सहयोग का वादा किया है, जिससे ऑटो पार्ट्स, इंजीनियरिंग गुड्स और फार्मा क्षेत्र में भारतीय कंपनियों के लिए एक बड़ा यूरोपीय बाजार खुलेगा। कूटनीतिक और आर्थिक समझौतों के साथ-साथ यह साझेदारी सांस्कृतिक धरातल पर भी गहरी हुई है जिसका प्रमाण भारत के प्राचीन उपनिषदों का स्लोवाक भाषा में अनुवाद किया जाना और वहां की एक यूनिवर्सिटी में 'इंडिया चेयर' स्थापित करने पर बनी सहमति है। भारत के प्रति इसी गहरे सम्मान को प्रदर्शित करते हुए स्लोवाकिया ने प्रधानमंत्री मोदी को अपने सर्वोच्च राजकीय नागरिक सम्मान 'द ऑर्डर ऑफ द व्हाइट डबल क्रॉस - फर्स्ट क्लास' से नवाजा है, जो किसी विदेशी गणमान्य व्यक्ति को दिया जाने वाला 33वां अंतरराष्ट्रीय सम्मान है और यह 140 करोड़ भारतीयों के बढ़ते वैश्विक कद का प्रतीक है।

भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से पोलैंड, यूक्रेन, हंगरी और ऑस्ट्रिया जैसे चार महत्वपूर्ण यूरोपीय देशों से घिरा स्लोवाकिया यूक्रेन युद्ध के बाद से नाटो का एक अग्रिम मोर्चा बन चुका है, जिससे भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और कनेक्टिविटी दोनों ही लिहाज से इसका महत्व बढ़ जाता है। इस दौरे पर 'अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे' (INSTC) में स्लोवाकिया को जोड़ने पर भी विस्तार से चर्चा हुई जो मुंबई से मास्को तक स्वेज नहर का एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है और इसके माध्यम से भारतीय माल मध्य व पश्चिमी यूरोप तक 40 प्रतिशत कम समय में पहुंच सकेगा, साथ ही परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर स्लोवाकिया के साथ छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) में सहयोग कर भारत अपने स्वच्छ ऊर्जा के लक्ष्यों को तेजी से हासिल कर सकता है। हालांकि, इस व्यापक साझेदारी को जमीन पर उतारना काफी चुनौतीपूर्ण होगा क्योंकि वर्तमान में व्यापार असंतुलन भारत के पक्ष में है और स्लोवाकिया चाहता है कि भारतीय कंपनियां उनके यहाँ ऑटोमोटिव, आईटी और फार्मा क्षेत्रों में संयुक्त उद्यम स्थापित करें, जिसके लिए वीजा प्रक्रिया को सरल बनाना होगा क्योंकि अभी भारतीय छात्रों और पेशेवरों को शेंगेन वीजा प्राप्त करने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा वहां चीन के बढ़ते निवेश और प्रभाव के बीच भारत को अपनी गुणवत्ता और भरोसे के दम पर जगह मजबूत करनी होगी। स्लोवाकिया का आकार भले ही छोटा हो लेकिन उसने दुनिया को यह बड़ा संदेश दे दिया है कि भारत अब केवल एक बाजार नहीं बल्कि एक भरोसेमंद वैश्विक भागीदार है, जिससे यह दौरा भारत की 'एक्ट ईस्ट' के साथ-साथ 'एक्ट यूरोप' नीति का एक प्रभावी विस्तार बन गया है जो वर्ष 2047 तक विकसित भारत के सपने को साकार करने में मदद करेगा और यूरोप के हृदय से शुरू हुई यह यात्रा आने वाले दशकों में भारत की वैश्विक भूमिका को एक नई दिशा देगी।

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