भोपाल, 18 जून।
खिलाड़ी देश के लिए मैदान पर अपना पसीना बहाता है और अपनी जान जोखिम में डालता है, जिसके बदले में उसे भविष्य की अनिश्चितता नहीं बल्कि एक मजबूत स्थायित्व चाहिए होता है और मध्यप्रदेश सरकार का यह नया फैसला 'खेलो और बढ़ो' का एक बेहद सकारात्मक संदेश देता है। राज्य सरकार ने गृह विभाग के माध्यम से मध्यप्रदेश पुलिस में उत्कृष्ट खिलाड़ियों की सीधी भर्ती के नियमों में व्यापक संशोधन किया है, जिसके तहत अब ओलंपिक, एशियाई खेल, कॉमनवेल्थ गेम्स और राष्ट्रीय खेलों के पदक विजेताओं को आरक्षक (कांस्टेबल) से लेकर उप निरीक्षक (सब-इंस्पेक्टर) के पदों पर सीधे सरकारी नियुक्ति दी जाएगी। इस विशेष नीति की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को लिखित परीक्षा, शारीरिक दक्षता परीक्षा और यहाँ तक कि ऊंचाई की अनिवार्य बाध्यता से भी पूरी तरह छूट रहेगी, जो यह साबित करता है कि यह फैसला केवल नौकरी देने का नहीं बल्कि खेल को एक सम्मानजनक और सुरक्षित करियर बनाने की दिशा में उठाया गया एक बेहद महत्वपूर्ण कदम है। पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों ने पहले ही यह साबित करके दिखाया है कि जब खिलाड़ियों को समय पर सरकारी नौकरी और उचित सम्मान मिलता है तो देश के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक भी आते हैं, और अब मध्यप्रदेश भी उसी सफल राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है जिससे न केवल पुलिस बल को बेहद फिट जवान मिलेंगे बल्कि खेल को भी एक नया करियर गोल हासिल होगा।
इन संशोधित नियमों के अनुसार ओलंपिक, एशियाई खेल, कॉमनवेल्थ गेम्स, विश्व कप या विश्व चैंपियनशिप में भाग लेने अथवा पदक जीतने वाले शीर्ष खिलाड़ियों को सीधे उप निरीक्षक बनाया जाएगा, जबकि राष्ट्रीय खेलों और अधिकृत राष्ट्रीय चैंपियनशिप में स्वर्ण, रजत या कांस्य पदक जीतने वाले खिलाड़ी आरक्षक पद के लिए पूरी तरह पात्र माने जाएंगे। ये सभी नियुक्तियां पूर्ण रूप से अनारक्षित श्रेणी में होंगी और सबसे खास बात यह है कि इसमें केवल उन्हीं खेलों को आधिकारिक मान्यता दी जाएगी जो पिछले तीन ओलंपिक आयोजनों में शामिल रहे हैं, जिससे फर्जी खेल प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरी हथियाने वाले सिंडिकेट पर पूरी तरह रोक लगाने में मदद मिलेगी। मध्यप्रदेश में खेल प्रतिभाओं की कभी कोई कमी नहीं रही है जहाँ भोपाल का ऐशबाग स्टेडियम हॉकी की नर्सरी माना जाता है और मलखंब के क्षेत्र में तो प्रदेश ने विश्व स्तर पर अपनी एक अनूठी पहचान बनाई है, इसके बावजूद अनेक होनहार खिलाड़ी पदक जीतने के बाद भी रोजगार और आजीविका के लिए सालों तक भटकते रहे हैं। अब पुलिस की वर्दी और बुढ़ापे में पेंशन की पक्की गारंटी मिलने से ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों के माता-पिता भी अपने बच्चों को खेलों में आगे बढ़ने के लिए पूरे दिल से प्रोत्साहित करेंगे, जिसका सबसे बड़ा दूरगामी लाभ हमारे आदिवासी अंचलों और ग्रामीण क्षेत्रों की उन छुपी हुई प्रतिभाओं को मिलेगा जिन्हें अब खेल के माध्यम से सीधे सरकारी तंत्र का हिस्सा बनने का अवसर प्राप्त होगा।
हालांकि, इस बेहतरीन खेल नीति के सफल और न्यायसंगत क्रियान्वयन के लिए प्रशासनिक स्तर पर बेहद सख्त निगरानी रखी जानी बहुत जरूरी है ताकि खेल प्रमाणपत्रों की प्रामाणिकता की जांच सीधे खेल प्राधिकरण से कराई जा सके और पूरी भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जा सके। इसके साथ ही, भविष्य में केवल गृह विभाग या पुलिस बल तक ही सीमित न रहकर शासन के अन्य महत्वपूर्ण विभागों में भी खिलाड़ियों के लिए विशेष कोटे के तहत अवसर बढ़ाए जाने चाहिए ताकि खेल संस्कृति को और अधिक व्यापक बनाया जा सके। सरकार ने इस दिशा में अपना पहला मजबूत कदम बढ़ा दिया है, लेकिन अब जरूरत इस बात की है कि ग्रामीण और जिला स्तर पर खेल अधोसंरचना (इंफ्रास्ट्रक्चर), अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रशिक्षकों (कोचेस) और एक दीर्घकालिक योजना पर तेजी से काम किया जाए। यदि यह अनूठी खेल नीति बिना किसी प्रशासनिक लापरवाही के जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू की जाती है, तो मध्यप्रदेश आने वाले वर्षों में देश के भीतर खेल प्रतिभाओं के सबसे बड़े हब के रूप में उभरेगा, क्योंकि खेल मैदान से निकलकर थानों तक पहुंचने वाली यह वर्दी न सिर्फ खिलाड़ियों का गौरव बढ़ाएगी बल्कि देश के युवाओं को खेलों के प्रति एक नया नजरिया भी प्रदान करेगी।














