भोपाल, 18 जून।
मध्यप्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर चल रही रायशुमारी ने जनता की आवाज को एक मजबूत मंच दिया है, जिसके परिणामस्वरूप कई दशकों से पाले गए सियासी मिथक एक झटके में बिखर गए हैं क्योंकि महज तीन दिन के भीतर सवा दो लाख सुझाव आ चुके हैं और इस प्रक्रिया में दो दिन में सवा तीन करोड़ लोगों तक एसएमएस भी भेजे जा चुके हैं। इस पूरे अभियान में सबसे बुलंद और मुखर आवाज महिलाओं की रही है, परंतु चर्चा की असली चिंगारी वह प्रशासनिक रिपोर्ट बनी है जिसने यह उजागर किया कि प्रदेश की 62% मुस्लिम महिलाओं में से केवल 31% ही उर्दू पढ़-लिख पाती हैं, जिसका सीधा अर्थ यह है कि 69% मुस्लिम महिलाएं उर्दू नहीं जानतीं बल्कि वे हिंदी और स्थानीय बोलियों में पढ़ती-लिखती हैं, सरकारी फॉर्म भरती हैं और अपने बच्चों को हिंदी माध्यम के स्कूलों में भेजती हैं। यह आंकड़ा इस कड़वी हकीकत का आईना है कि किस तरह वोट बैंक की सियासत ने भाषा को मजहब की जंजीर बनाकर एक पूरे समुदाय, विशेषकर महिलाओं को मुख्यधारा से काटने का प्रयास किया, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि मध्यप्रदेश में पटवारी के खसरे से लेकर अस्पताल की पर्ची और प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर निजी क्षेत्र की नौकरियों तक हर जगह हिंदी और अंग्रेजी का ही बोलबाला है, जिसके कारण इन महिलाओं का हिंदी जानना कोई मजबूरी नहीं बल्कि उनकी समझदारी है।
13 जून की समय-सीमा से पहले राज्य सरकार द्वारा मांगे गए इन सुझावों में छतरपुर, सागर, रीवा, सतना, जबलपुर और विंध्य के जिलों की मुस्लिम महिलाओं ने तीन तलाक, निकाह-हलाला, बहुविवाह और संपत्ति में असमान हिस्सेदारी जैसी रूढ़िवादी प्रथाओं के विरुद्ध खुलकर अपनी आवाज उठाई है और बराबरी के कानूनी अधिकारों की मांग की है। यूसीसी का विरोध करने वाले संगठन भले ही उर्दू और इस्लाम के खतरे में होने का राजनीतिक नारा देते हों, लेकिन ग्वालियर, चंबल और जबलपुर में उच्च स्तरीय समिति को मिले सुझाव बताते हैं कि आम मुसलमान इस कानून से डरा नहीं बल्कि आशान्वित है, क्योंकि वे जानते हैं कि तरक्की की चाबी आधुनिक शिक्षा से खुलेगी न कि सिर्फ उर्दू से, जहाँ मदरसों में विज्ञान और गणित की उपेक्षा के कारण आज मुस्लिम महिलाओं में स्नातक दर केवल 14% रह गई है जो कि 27% के राष्ट्रीय औसत से बेहद कम है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा इस प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिए सभी कलेक्टरों को अधिक से अधिक सुझाव लेने के निर्देश दिए गए हैं ताकि भविष्य में कोई यह न कह सके कि उनसे पूछा नहीं गया, वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि इस कानून को लागू करते समय यह भी ध्यान रखना होगा कि एकसमानता का अर्थ एकरूपता नहीं है, जिससे आदिवासी रीति-रिवाज और क्षेत्रीय परंपराएं तो सुरक्षित रहें लेकिन लैंगिक भेदभाव पूरी तरह समाप्त हो जाए।
इस रायशुमारी से मिले 2.25 लाख सुझाव केवल एक संख्या नहीं हैं बल्कि एक नए सामाजिक अनुबंध का स्पष्ट संकेत हैं, जो यह दर्शाता है कि मुस्लिम महिलाएं अब धार्मिक या सियासी संरक्षण के बजाय सीधे तौर पर संविधान से उम्मीद कर रही हैं और मौलानाओं के बजाए देश की कानूनी व्यवस्था पर भरोसा जता रही हैं। उर्दू निश्चित रूप से गालिब, फैज और मंटो की एक बेहद खूबसूरत सांस्कृतिक विरासत है जिसे बचाया जाना चाहिए, परंतु इसे पहचान का ठप्पा बनाकर महिलाओं को विकास की मुख्यधारा से अलग रखना कतई उचित नहीं है, इसलिए सरकार को मदरसों के आधुनिकीकरण के साथ-साथ हर जिले में महिला कानून मित्र नियुक्त कर कानूनी साक्षरता अभियान चलाना चाहिए जो हिंदी में महिलाओं को उनके अधिकार समझा सकें। अंततः यह पूरी रायशुमारी यह साबित करती है कि समाज राजनीति से बहुत आगे निकल चुका है और जब एक पीड़ित महिला को पति की संपत्ति में बेटे के बराबर हिस्सा या भरण-पोषण का हक चाहिए होता है तो उसकी भाषा हिंदी है या उर्दू इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि भूख हिंदी में लगती है और दर्द हर जुबान में एक जैसा होता है, और देश का यह नया सामाजिक अनुबंध यही कहता है कि हमें मजहब के नाम पर अलग कानून नहीं बल्कि नागरिक के नाम पर समान अधिकार चाहिए, क्योंकि देश भाषा से नहीं बल्कि नागरिक बराबरी से बनता है।















