भोपाल, 18 जून।
बिजली अब खंभों से नहीं बल्कि छतों से आएगी और मध्यप्रदेश में प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना इसी बड़े बदलाव की इबारत लिख रही है, परंतु इस सौर क्रांति के साथ एक नया सरप्लस संकट भी खड़ा हो गया है। घरों की छतों पर सोलर पैनल लगाने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जिसके मद्देनजर मप्र विद्युत नियामक आयोग की जनसुनवाई में आपत्तिकर्ताओं ने फिक्स चार्ज की वसूली पूरी तरह बंद करने और नियमों में ऐसा कोई बदलाव न करने की पुरजोर मांग उठाई है जिससे उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़े। प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना के तहत मध्यप्रदेश को छह लाख रूफटॉप सोलर संयंत्र लगाने का विशाल लक्ष्य दिया गया था, लेकिन हकीकत यह है कि 13 जून तक केवल 13 हजार उपभोक्ता ही इस योजना से जुड़ पाए हैं क्योंकि बैंकों की ऋण देने में टालमटोल, नेट मीटरिंग में देरी और बिजली कंपनियों की प्रशासनिक अड़चनों के कारण यह योजना अभी रफ्तार नहीं पकड़ सकी है। उपभोक्ताओं का दर्द यह है कि तीन किलोवाट का सिस्टम लगाने में लगभग 1.80 लाख रुपये खर्च होते हैं और भारी सब्सिडी मिलने के बाद भी करीब 60 हजार रुपये अपनी जेब से लगाने पड़ते हैं, जिस पर सात साल की किस्त और ब्याज मिलाकर आर्थिक बोझ और ज्यादा बढ़ जाता है। इसके अलावा घरेलू उपभोक्ताओं का यह भी गंभीर आरोप है कि बिजली कंपनियां उनसे सरप्लस (अतिरिक्त) बिजली मात्र 2.15 रुपये प्रति यूनिट की बेहद कम दर से खरीदती हैं और उसी बिजली को अन्य उपभोक्ताओं को 8 से 10 रुपये प्रति यूनिट तक की ऊँची दरों पर बेच देती हैं, जो कि पूरी तरह से अनुचित प्रतीत होता है।
इस जनसुनवाई के दौरान विद्युत लोकपाल की नियुक्ति संबंधी नियमों पर भी चर्चा हुई, जिसमें टीकमगढ़ के अधिवक्ता निर्मल लोहिया ने आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि प्रस्तावित प्रावधानों में लोकपाल नियुक्ति प्रक्रिया से अधिवक्ताओं को ही बाहर किया जा रहा है जो न्यायसंगत नहीं है। उपभोक्ता संगठनों का स्पष्ट कहना है कि सोलर संयंत्र लगाने के बाद भी बिजली बिल में 200 से 400 रुपये तक फिक्स चार्ज का आना प्रधानमंत्री की मुफ्त सूर्य घर योजना की मूल भावना के विपरीत है, और यदि उपभोक्ताओं को इसका वास्तविक लाभ नहीं मिल रहा है तो योजना के नाम से 'मुफ्त' शब्द को ही हटा दिया जाना चाहिए। इसके विपरीत बिजली कंपनियां ग्रिड मेंटेनेंस के खर्च का तर्क देती हैं, लेकिन उपभोक्ता सवाल उठा रहे हैं कि जब वे स्वयं ग्रिड को बिजली दे रहे हैं तो उनसे यह अतिरिक्त शुल्क क्यों वसूला जा रहा है। सोलर क्षेत्र में एक बड़ी असमानता यह भी उभरकर आई है कि संपन्न परिवारों ने तो सब्सिडी का लाभ उठाकर पांच से दस किलोवाट तक के बड़े संयंत्र लगा लिए हैं, जबकि आर्थिक रूप से कमजोर परिवार एक किलोवाट का छोटा संयंत्र लगाने में भी पूरी तरह असमर्थ हैं, जिसे देखते हुए बिजली कंपनियों और ऊर्जा विभाग ने भी माना है कि इस योजना की नीतियों में बड़े सुधार की तत्काल जरूरत है।
इस गंभीर समस्या के व्यावहारिक समाधान के रूप में एक चार सूत्री फॉर्मूला सामने आया है, जिसके तहत पहला कदम नेट मीटरिंग की प्रक्रिया को बेहद सरल बनाना और सात दिन में कनेक्शन न मिलने पर संबंधित अधिकारियों पर जुर्माना लगाना है। दूसरा, सरप्लस बिजली की खरीदी दर को कम से कम पांच रुपये प्रति यूनिट तय किया जाए या केंद्रीय विद्युत विनियामक आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार 75 प्रतिशत डिस्कवर्ड टैरिफ पर इसकी खरीदी हो; तीसरा, उन घरों के लिए फिक्स चार्ज को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाए जो 300 यूनिट से अधिक बिजली ग्रिड को वापस देते हैं; और चौथा, समूह सोलर मॉडल (कम्युनिटी सोलर) को बढ़ावा दिया जाए जिसमें किसी कॉलोनी के कई घर मिलकर बड़ा संयंत्र लगा सकें जिससे लागत कम होगी। इसके साथ ही, वर्तमान में लागू 9 से 10 प्रतिशत की भारी ब्याज दर को कम करने के लिए नाबार्ड और भारतीय स्टेट बैंक को मिलकर मात्र 4 प्रतिशत ब्याज दर पर विशेष 'सूर्य मित्र ऋण योजना' की शुरुआत करनी चाहिए। मध्यप्रदेश सरकार ने सौर ऊर्जा को एक जन-आंदोलन बनाने की सराहनीय कोशिश की है और जनता भी इसके लिए तैयार है, परंतु यदि बिजली कंपनियां अपने पुराने ढर्रे पर ही अड़ी रहीं तो यह योजना केवल फाइलों तक ही सीमित रह जाएगी। यदि अवार्ड्स-2026 में आयोग ने उपभोक्ताओं की इन जायज मांगों को स्वीकार कर लिया तो मध्यप्रदेश देश का पहला ऐसा आदर्श राज्य बन सकता है जहाँ बिजली का बिल शून्य होने के साथ-साथ वह आम जनता के लिए आय का एक नया स्रोत बने, क्योंकि सूरज तो सबको समान रूप से रोशनी देता है और अब यह सरकार को तय करना है कि वह रोशनी जनता के घरों को रोशन करे या बिजली कंपनियों के बहीखातों में ही कैद होकर रह जाए।















