नई दिल्ली, 22 अक्टूबर।
सर्वोच्च न्यायालय की पीठ, न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी एवं न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया ने तेजाराम बनाम स्टेट ऑफ राजस्थान की याचिका में निर्णय दिया है कि रिश्वत मांगना अपराध है, यह सरकारी कार्य नहीं है। इसमें अभियोजन की स्वीकृति का लाभ नहीं दिया जा सकता।
याचिका के तथ्यों के अनुसार, आरोपी तेजाराम राजस्थान पुलिस का सिपाही था और सिरोही में डीवाईएसपी कार्यालय में पदस्थ था। शिकायतकर्ता भी सिपाही देवेंद्र कुमार था, जिसका आरोप था कि तेजाराम ने एसपी साहब के नाम पर 1.5 लाख रुपये रिश्वत मांगी। आरोपी के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया और उसे गिरफ्तार किया गया।
आरोपी तेजाराम ने बिना अभियोजन की स्वीकृति आपराधिक प्रकरण दर्ज करने को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उसका बचाव था कि शिकायत झूठी है और बदला लेने के लिए की गई है। साथ ही, भ्रष्टाचार निवारण संशोधन अधिनियम, 2018 की धारा 17-ए के तहत पहले सरकार से अभियोजन की अनुमति नहीं ली गई, इसलिए प्रकरण विचारणीय नहीं है।
भ्रष्टाचार निवारण संशोधन अधिनियम, 2018 का प्रावधान क्या है?
यदि किसी सरकारी अधिकारी ने ड्यूटी निभाते हुए कोई सिफारिश की या निर्णय लिया, तो उसके खिलाफ जांच से पहले सरकार से सहमति लेना आवश्यक है। इसका उद्देश्य यह है कि ईमानदारी से लिए गए फैसलों के लिए अधिकारियों को परेशान न किया जाए।
सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय में कहा कि भ्रष्टाचार निवारण संशोधन अधिनियम, 2018 की धारा 17-ए हर मामले में लागू नहीं होगी। यह व्यापक संरक्षण नहीं है। इसका निर्णायक शब्द है, "सेवा के दौरान अपने कार्य का निर्वहन करते हुए", अर्थात ड्यूटी पर रहते हुए। रिश्वत मांगना, गबन और धोखाधड़ी कभी भी सरकारी सेवा का हिस्सा नहीं हो सकते। इसलिए रिश्वत मांगने के मामले में धारा 17-ए के तहत अनुमति की आवश्यकता नहीं है। आरोपी के विरुद्ध जांच और आरोपपत्र विधिसम्मत हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने राजस्थान उच्च न्यायालय का निर्णय बरकरार रखते हुए कहा कि रिश्वत मांगना विशुद्ध आपराधिक कृत्य है। यह लोकसेवक के सरकारी कार्य से जुड़ा नहीं है।













