26 मार्च
जब भगवान राम का जन्म हुआ, तब केवल धरती पर ही नहीं, बल्कि आकाश में भी एक अद्भुत और दुर्लभ संयोग बन रहा था। पौराणिक ग्रंथ रामायण और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, उनका जन्म चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को, मध्यान्ह के समय हुआ था। उस समय पुनर्वसु नक्षत्र का प्रभाव था, जो अत्यंत शुभ और पवित्र माना जाता है। कहा जाता है कि इस नक्षत्र में जन्म लेने वाला व्यक्ति शांत, धर्मप्रिय और लोककल्याण करने वाला होता है। और यही गुण भगवान राम के जीवन में साफ दिखाई देते हैं।

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इतना ही नहीं, उस समय ग्रहों की स्थिति भी असाधारण थी। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम का जन्म कर्क लग्न में हुआ था, जो करुणा, संवेदनशीलता और संरक्षण का प्रतीक है। विशेष बात यह मानी जाती है कि उस समय पाँच प्रमुख ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, बृहस्पति और शुक्र अपनी-अपनी उच्च स्थिति में थे। उदाहरण के लिए, सूर्य मेष राशि में, मंगल मकर में, बृहस्पति कर्क में, शुक्र मीन में और शनि तुला में स्थित थे। यह एक अत्यंत दुर्लभ योग माना जाता है, जो किसी असाधारण और दिव्य व्यक्तित्व के जन्म का संकेत देता है। इस तरह का ग्रह संयोग यह दर्शाता है कि जन्म लेने वाला व्यक्ति केवल एक राजा ही नहीं, बल्कि एक युग-पुरुष होगा, जो धर्म की स्थापना करेगा और संसार को एक नई दिशा देगा।
यही कारण है कि भगवान राम का जन्म केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक घटना नहीं माना जाता, बल्कि इसे एक दैवीय योजना का हिस्सा समझा जाता है। जब आकाश के तारे और ग्रह इस तरह एक साथ मिलते हैं, तो वह केवल संयोग नहीं, बल्कि एक संकेत होता है कि धरती पर कुछ विशेष होने वाला है। राम नवमी इसी दिव्य क्षण की याद दिलाती है। वह क्षण जब पूरे ब्रह्मांड ने मिलकर एक ऐसे अवतार का स्वागत किया, जिसने मानवता को सत्य, मर्यादा और धर्म का मार्ग दिखाया।











