26 मार्च
बहुत समय पहले, सरयू नदी के किनारे बसी पवित्र नगरी अयोध्या में एक महान और प्रतापी राजा दशरथ का राज्य था। उनके पास धन, वैभव और शक्ति की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उनके जीवन में एक ऐसा खालीपन था, जो उन्हें भीतर ही भीतर तोड़ रहा था। उनकी कोई संतान नहीं थी। हर दिन उनके मन में यही चिंता रहती कि उनके बाद उनके वंश का क्या होगा। एक दिन उन्होंने अपने कुलगुरु ऋषि वशिष्ठ से अपनी पीड़ा साझा की। ऋषि वशिष्ठ ने उनकी आँखों में छिपा दर्द समझा और उन्हें एक दिव्य उपाय बताया—पुत्रेष्टि यज्ञ। इस यज्ञ को संपन्न कराने के लिए महान तपस्वी ऋषि श्रृंगी को बुलाया गया। जैसे ही यज्ञ की पवित्र अग्नि प्रज्वलित हुई, वातावरण मंत्रों की गूंज से भर गया, मानो स्वयं देवता इस क्षण के साक्षी बन गए हों।

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यज्ञ के समापन पर एक अद्भुत चमत्कार हुआ—अग्नि से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए और उन्होंने एक स्वर्ण पात्र में भरी खीर राजा दशरथ को सौंपी। उन्होंने कहा कि इस प्रसाद को अपनी रानियों में बाँट दें, इससे उन्हें संतान प्राप्त होगी। राजा ने अत्यंत श्रद्धा से वह खीर अपनी तीनों रानियों कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा को दे दी। समय बीतता गया और फिर आया वह पावन दिन—चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी। जैसे ही मध्यान्ह का समय हुआ, पूरे महल में एक अलौकिक प्रकाश फैल गया और माता कौशल्या ने एक दिव्य बालक को जन्म दिया—वही थे भगवान राम। यह केवल एक राजकुमार का जन्म नहीं था, बल्कि स्वयं विष्णु का अवतार था, जो धरती पर अधर्म के अंत और धर्म की स्थापना के लिए आए थे। उसी समय कैकेयी से भरत और सुमित्रा से लक्ष्मण व शत्रुघ्न का जन्म हुआ, और अयोध्या नगरी में खुशियों की लहर दौड़ गई।

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यही वह क्षण था, जिसने राम नवमी को एक साधारण तिथि से एक दिव्य पर्व बना दिया। आगे चलकर भगवान राम ने अपने जीवन में हर उस आदर्श को जीवित किया, जिसे मनुष्य अपने जीवन में अपनाना चाहता है—सत्य, कर्तव्य, त्याग और मर्यादा। उन्होंने अपने पिता के वचन को निभाने के लिए राजपाट छोड़कर वनवास स्वीकार किया और अंत में राक्षस राजा रावण का वध कर संसार को अन्याय से मुक्त किया। यही कारण है कि राम नवमी केवल एक जन्मोत्सव नहीं, बल्कि यह उस विश्वास की कहानी है कि जब भी दुनिया में अंधकार बढ़ता है, तब एक नई रोशनी जन्म लेती है। आज भी जब यह दिन आता है, तो हर घर, हर मंदिर में वही आनंद, वही श्रद्धा और वही आस्था जीवित हो उठती है, मानो अयोध्या की वह दिव्य सुबह फिर से लौट आई हो।

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