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17 Apr, 2026

लोकसभा में 131वां संशोधन विधेयक गिरा, महिला आरक्षण के जल्द लागू होने की उम्मीद को झटका

लोकसभा में 131वां संविधान संशोधन विधेयक 298 सदस्यों के समर्थन और 230 के विरोध के बावजूद आवश्यक बहुमत न मिलने से खारिज हो गया, जिससे महिला आरक्षण के शीघ्र क्रियान्वयन की संभावना टल गई।

नई दिल्ली, 17 अप्रैल

लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 को आज मतदान के बाद खारिज कर दिया गया, जिसका उद्देश्य सदन की सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करना और महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण के शीघ्र क्रियान्वयन का मार्ग प्रशस्त करना था।

करीब 21 घंटे चली लंबी बहस के बाद कुल 528 सांसदों ने मतदान में हिस्सा लिया, जिनमें से 298 ने विधेयक के समर्थन में और 230 ने विरोध में वोट दिया। संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत यानी 352 मतों की जरूरत थी, लेकिन प्रस्ताव 54 मतों से पीछे रह गया और पारित नहीं हो सका।

वर्ष 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम को दोनों सदनों में सर्वसम्मति से मंजूरी मिली थी, लेकिन उसके लागू होने को आगामी जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ा गया था। नए संशोधन का उद्देश्य इसी प्रक्रिया को तेज करते हुए महिलाओं को जल्द प्रतिनिधित्व दिलाना था, जो अब संभव नहीं हो पाया।

यह विधेयक लोकसभा की कुल सीटों को बढ़ाकर महिलाओं के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों का निर्माण करने की दिशा में तैयार किया गया था, ताकि किसी भी राज्य के मौजूदा प्रतिनिधित्व या सामान्य वर्ग की सीटों में कमी किए बिना आरक्षण लागू किया जा सके।

सरकार का तर्क था कि सीटों में विस्तार से महिला आरक्षण को वर्ष 2029 के आम चुनाव तक लागू किया जा सकता है, जिससे संसद में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी और उन्हें कानून निर्माण में अधिक अवसर मिलेंगे।

लंबी और तीखी बहस के दौरान विभिन्न दलों के बीच इस प्रस्ताव को लेकर मतभेद स्पष्ट रूप से सामने आए। सीटों में बड़े स्तर पर वृद्धि, संघीय संतुलन पर असर और परिसीमन से जुड़े पहलुओं को लेकर कई सदस्यों ने आपत्ति जताई।

मतदान से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी सांसदों से अपील करते हुए कहा था कि वे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर देश की महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए इस विधेयक का समर्थन करें।

इसके बावजूद, व्यापक सहमति नहीं बन सकी और अंततः विधेयक असफल हो गया। इस घटनाक्रम के बाद महिला आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया एक बार फिर भविष्य की जनगणना और परिसीमन पर निर्भर हो गई है।

अब तक सरकार ने आगे की रणनीति को लेकर कोई संकेत नहीं दिया है। यह स्पष्ट नहीं है कि संशोधित प्रस्ताव लाया जाएगा या मौजूदा प्रावधानों के अनुसार ही आगे बढ़ा जाएगा। इस परिणाम ने एक बार फिर महिला सशक्तिकरण और प्रतिनिधित्व से जुड़े जटिल मुद्दों को सामने ला दिया है।

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