16 अप्रैल।
भारत की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ी है। केंद्र सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने और महिलाओं को 33% आरक्षण देने की दिशा में सक्रिय दिखाई दे रही है। यह पहल जहां एक ओर महिला सशक्तिकरण की ऐतिहासिक पहल मानी जा रही है, वहीं दूसरी ओर इससे देश के संघीय ढांचे और क्षेत्रीय संतुलन को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े हो रहे हैं।
वर्तमान में लोकसभा में 543 सीटें हैं। प्रस्ताव के अनुसार इन्हें बढ़ाकर लगभग 850 किया जा सकता है। इसमें करीब 815 सीटें राज्यों के लिए और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए होंगी। इसी के साथ महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित करने का प्रावधान भी लाया जा रहा है। सरकार इस दिशा में संविधान संशोधन विधेयक लाने की तैयारी कर रही है, जिसे व्यापक तौर पर महिला आरक्षण से जोड़ा जा रहा है। यदि यह लागू होता है, तो लोकसभा में महिलाओं की संख्या लगभग 273 तक पहुंच सकती है।
इस पूरे मुद्दे का केंद्र परिसीमन है, यानी जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण। सरकार 2011 की जनगणना को आधार बनाने पर विचार कर रही है और यहीं से विवाद शुरू होता है। यदि सीटें जनसंख्या के आधार पर बढ़ती हैं, तो उत्तर भारत के बड़े राज्यों को अधिक सीटें मिलेंगी, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों को अपेक्षाकृत कम लाभ होगा।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर साफ कहा कि दक्षिणी राज्यों को यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं है। उनका तर्क है कि दक्षिण भारत ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया है और अब उसी के कारण उनका प्रतिनिधित्व कम किया जा रहा है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने भी इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि यह दक्षिणी राज्यों के साथ अन्याय है और इससे देश में क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ सकता है।
इस प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक माहौल भी गरम हो गया है। राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने आरोप लगाया है कि सरकार यह कदम 2029 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर उठा रही है। उनका कहना है कि महिला आरक्षण को लागू करने के लिए सीटें बढ़ाना जरूरी नहीं है, इसे मौजूदा 543 सीटों में भी लागू किया जा सकता है। विपक्ष का मानना है कि परिसीमन और आरक्षण को जोड़कर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश हो रही है।
यदि प्रस्ताव लागू होता है, तो राज्यों में सीटों का गणित पूरी तरह बदल सकता है। उत्तर प्रदेश 80 से बढ़कर लगभग 120 सीटें, बिहार 40 से बढ़कर 60 सीटें, महाराष्ट्र 48 से बढ़कर 72 सीटें, मध्य प्रदेश में भी सीटों में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है, जबकि दक्षिणी राज्यों में अपेक्षाकृत सीमित बढ़ोतरी होने की संभावना है। महिला आरक्षण लागू होने पर इन राज्यों में बड़ी संख्या में सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी।
भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी लंबे समय से कम रही है। 33% आरक्षण का यह प्रस्ताव महिलाओं को नीति-निर्माण में अधिक भागीदारी देगा। यह कदम केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व ही नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का भी प्रतीक बन सकता है। इससे महिलाओं की आवाज संसद में और मजबूत होगी।
इस पूरे मुद्दे ने एक बार फिर उत्तर और दक्षिण भारत के बीच असंतुलन की बहस को तेज कर दिया है। दक्षिणी राज्यों का कहना है कि उन्होंने विकास और जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, जबकि उत्तर भारत को अधिक लाभ मिल रहा है। वहीं समर्थकों का तर्क है कि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का आधार जनसंख्या होना चाहिए—जहां अधिक लोग, वहां अधिक प्रतिनिधि।
इस जटिल मुद्दे का समाधान आसान नहीं है, लेकिन कुछ संभावित रास्ते हैं। महिला आरक्षण को परिसीमन से अलग लागू किया जाए, जनसंख्या के साथ अन्य मानकों को भी शामिल किया जाए, सभी राज्यों के बीच सहमति बनाकर निर्णय लिया जाए और दक्षिणी राज्यों के हितों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए जाएं।
लोकसभा सीटों का विस्तार और महिला आरक्षण—दोनों ही भारत के लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं, लेकिन इनका क्रियान्वयन इस तरह होना चाहिए कि किसी भी क्षेत्र को नुकसान न हो। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह विकास, प्रतिनिधित्व और क्षेत्रीय संतुलन—तीनों को साथ लेकर चले। यदि यह संतुलन बनता है, तो यह बदलाव भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।