संपादकीय
01 Apr, 2026

महिला खेलों में ‘लैंगिक परीक्षण’ की नई शर्तें: समानता और गरिमा पर उठते गंभीर सवाल

अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति द्वारा महिलाओं के खेलों में अनिवार्य लैंगिक परीक्षण लागू करने के निर्णय ने समानता, निष्पक्षता और खिलाड़ी गरिमा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

खेलों की दुनिया में निष्पक्षता बनाए रखने की जरूरत निर्विवाद है, लेकिन यह लक्ष्य यदि मूलभूत अधिकारों की कीमत पर हासिल किया जाए तो वह न्याय नहीं, बल्कि असंतुलन पैदा करता है। अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति द्वारा हाल ही में लिया गया निर्णय, जिसमें ट्रांसजेंडर महिलाओं और लैंगिक विकास में भिन्नता रखने वाली खिलाड़ियों पर महिला वर्ग में भागीदारी को सीमित करने के साथ-साथ अनिवार्य ‘एसआरवाई टेस्ट’ लागू किया गया है, इसी द्वंद्व को सामने लाता है।

पहली नजर में यह नीति खेलों में समान अवसर और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने की कोशिश लगती है। तर्क दिया जा रहा है कि जैविक अंतर कुछ खिलाड़ियों को अतिरिक्त लाभ दे सकते हैं, जिससे प्रतियोगिता का संतुलन बिगड़ सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस जटिल जैविक वास्तविकता को एक मात्र परीक्षण के आधार पर तय किया जा सकता है? विज्ञान स्पष्ट करता है कि लैंगिक पहचान केवल गुणसूत्रों का मामला नहीं है, बल्कि हार्मोन, शारीरिक संरचना और कई अन्य कारकों का सम्मिलित परिणाम है। ऐसे में केवल ‘एसआरवाई जीन’ की उपस्थिति को निर्णायक मान लेना वैज्ञानिक रूप से भी अधूरा दृष्टिकोण है।

इतिहास भी इस दिशा में सावधानी बरतने की सलाह देता है। 1990 के दशक के बाद स्वयं ओलंपिक तंत्र ने सार्वभौमिक लैंगिक परीक्षणों को इसलिए खत्म करना शुरू किया था क्योंकि वे न केवल अविश्वसनीय थे, बल्कि नैतिक रूप से भी विवादास्पद थे। आज उसी रास्ते पर लौटना यह दर्शाता है कि खेल प्रशासन में निरंतरता और वैज्ञानिक दृष्टि का अभाव है।

इस नीति का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह समानता के सिद्धांत को कमजोर करती है। पुरुष खिलाड़ियों पर ऐसी कोई अनिवार्य चिकित्सीय जांच लागू नहीं होती, जबकि महिला खिलाड़ियों के लिए नई बाधाएं खड़ी की जा रही हैं। इससे विशेष रूप से उन खिलाड़ियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा जो सीमित संसाधनों से आते हैं। महंगे परीक्षण, जटिल प्रक्रियाएं और सामाजिक कलंक — ये सभी मिलकर उनके लिए खेलों में प्रवेश और भी कठिन बना देंगे।

इसके साथ ही, यह निर्णय निजता और गरिमा के अधिकार पर भी सीधा आघात करता है। किसी खिलाड़ी की पहचान को प्रयोगशाला के दायरे में सीमित करना न केवल अमानवीय है, बल्कि यह उनके आत्मसम्मान को भी चोट पहुंचाता है। खेल, जो समावेश और अवसर का प्रतीक होना चाहिए, वहां इस तरह की नीतियां बहिष्कार की भावना को जन्म देती हैं।

एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इस बहस में असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। महिला खिलाड़ियों को आज भी असमान फंडिंग, प्रशिक्षण सुविधाओं की कमी, वेतन असमानता और लैंगिक हिंसा जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं के समाधान के बजाय ध्यान जैविक परीक्षणों पर केंद्रित करना कहीं न कहीं प्राथमिकताओं के विचलन को दर्शाता है।

निष्पक्षता और सुरक्षा के नाम पर बनाई जाने वाली किसी भी नीति को वैज्ञानिक प्रमाणों और मानवीय संवेदनाओं के संतुलन पर आधारित होना चाहिए। यदि यह संतुलन बिगड़ता है, तो वह नीति अपने उद्देश्य से भटक जाती है। खेलों की सच्ची भावना तभी जीवित रह सकती है, जब वह सभी खिलाड़ियों को समान अवसर, सम्मान और गरिमा के साथ आगे बढ़ने का अवसर दे — न कि उन्हें संदेह और भेदभाव के दायरे में सीमित कर दे।

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