मिडिल ईस्ट में ईरान, इज़रायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव, समुद्री मार्गों में घटनाओं और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी आशंकाओं के बीच क्षेत्र में बड़े संघर्ष की संभावना को लेकर वैश्विक चिंता तेज हो गई है।
21 अप्रैल।
मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) एक बार फिर वैश्विक चिंता का केंद्र बनता जा रहा है। ईरान, इज़रायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने दुनिया भर में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या क्षेत्र एक बार फिर बड़े युद्ध की ओर बढ़ रहा है। हाल की घटनाओं, विशेष रूप से समुद्री मार्गों में तनाव, भारतीय जहाजों को निशाना बनाए जाने और सीज़फायर पर सवाल ने स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया है।
हाल के घटनाक्रमों में भारत के दो जहाजों को निशाना बनाए जाने और कई अन्य जहाजों को रोके जाने की खबरों ने नई चिंता पैदा की है। खाड़ी क्षेत्र से होकर गुजरने वाले ये जहाज कच्चा तेल और गैस लेकर आते हैं, जो भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। भारत ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए ईरान के राजदूत को तलब कर विरोध दर्ज कराया। यह कदम दर्शाता है कि भारत अपनी समुद्री सुरक्षा और आर्थिक हितों को लेकर बेहद सतर्क है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना जानबूझकर की गई कार्रवाई भी हो सकती है या फिर बढ़ते तनाव के बीच हुई कोई गलतफहमी।
मिडिल ईस्ट के इस पूरे तनाव का केंद्र हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य है। यह वह संकीर्ण समुद्री मार्ग है, जहां से दुनिया का लगभग 20% तेल गुजरता है। यदि यहां किसी भी प्रकार का व्यवधान आता है, तो उसका असर सीधे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ईरान द्वारा इस जलडमरूमध्य को बंद करने की धमकी कोई नई बात नहीं है, लेकिन हर बार यह वैश्विक बाजारों में हलचल पैदा कर देती है। हालांकि, इसे पूरी तरह बंद करना ईरान के लिए भी नुकसानदायक होगा, क्योंकि उसकी अपनी अर्थव्यवस्था भी तेल निर्यात पर निर्भर है।
हाल ही में लागू किया गया सीज़फायर (युद्धविराम) अब कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है। ईरान ने अमेरिका पर समझौते के उल्लंघन का आरोप लगाया है, जबकि अमेरिका का दावा है कि वह क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए कदम उठा रहा है। डोनाल्ड ट्रंप के बयान इस तनाव को और बढ़ाते नजर आते हैं। उन्होंने कहा है कि ईरान के साथ समझौते में कोई बड़ी बाधा नहीं है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि सैन्य दबाव जारी रहेगा। यह दोहरी रणनीति—बातचीत और दबाव—अमेरिका की पारंपरिक विदेश नीति का हिस्सा रही है।
विशेषज्ञों के बीच इस बात को लेकर मतभेद है कि हाल की घटनाएं महज गलतफहमी का परिणाम हैं या फिर किसी बड़े रणनीतिक खेल का हिस्सा। खाड़ी क्षेत्र में अक्सर जहाजों की पहचान को लेकर भ्रम होता है, खासकर तब जब तनाव चरम पर हो। दूसरी ओर, यह भी संभव है कि ईरान समुद्री मार्गों पर दबाव बनाकर अमेरिका और उसके सहयोगियों को संदेश देना चाहता हो। इस तरह की रणनीति को “स्ट्रैटेजिक सिग्नलिंग” कहा जाता है, जिसमें सीधे युद्ध के बिना शक्ति का प्रदर्शन किया जाता है।
तनाव के बावजूद कूटनीतिक प्रयास पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। इतिहास गवाह है कि ईरान और अमेरिका के बीच कई बार अप्रत्यक्ष (बैक-चैनल) बातचीत होती रही है। अंतरराष्ट्रीय दबाव, विशेष रूप से यूरोपीय देशों और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका, इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि दोनों पक्ष यह महसूस करते हैं कि युद्ध उनके हित में नहीं है, तो बातचीत फिर से शुरू होने की संभावना बनी रहती है।
वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए यह कहना जल्दबाजी होगी कि युद्ध निश्चित है, हालांकि जोखिम जरूर बढ़ गया है। मिडिल ईस्ट में अक्सर ऐसा देखा गया है कि छोटी घटनाएं बड़े संघर्ष का रूप ले लेती हैं। फिर भी, एक पूर्ण युद्ध सभी पक्षों के लिए भारी नुकसानदायक होगा—चाहे वह आर्थिक हो, राजनीतिक हो या मानवीय। यही कारण है कि तमाम तनाव के बावजूद देश सीधे टकराव से बचने की कोशिश करते हैं।
यदि स्थिति और बिगड़ती है तो भारत पर इसका सीधा असर पड़ेगा—तेल की कीमतों में वृद्धि, आयात बिल में बढ़ोतरी, महंगाई पर दबाव और खाड़ी देशों में काम कर रहे भारतीयों की सुरक्षा जैसे मुद्दे सामने आएंगे। भारत की विदेश नीति इस समय संतुलन बनाए रखने पर केंद्रित है, ताकि वह सभी पक्षों के साथ अपने संबंधों को सुरक्षित रख सके।
मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव एक गंभीर वैश्विक चुनौती बन चुका है। ईरान, इज़रायल और अमेरिका के बीच जटिल संबंधों और अविश्वास ने स्थिति को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। हालांकि, अभी भी कूटनीति और संवाद के रास्ते खुले हैं। यदि सभी पक्ष संयम और समझदारी से काम लें तो एक बड़े युद्ध को टाला जा सकता है, लेकिन यदि छोटी-छोटी घटनाएं नियंत्रण से बाहर होती हैं, तो यह क्षेत्र एक बार फिर आग की लपटों में घिर सकता है। इस समय सबसे बड़ी जरूरत है संवाद, संतुलन और धैर्य की।