21 अप्रैल।
नासिक के स्वयंभू बाबा अशोक खैरात पर लगे यौन शोषण और रेप के आरोप पहले ही इस मामले को घिनौना और विस्फोटक बना चुके थे, लेकिन अब इस केस के अहम गवाह डॉ. जितेंद्र शेल्के और उनकी पत्नी अनुराधा शेल्के की समृद्धि मार्ग पर हुई संदिग्ध सड़क दुर्घटना में मौत ने पूरे प्रकरण को और भी ज्यादा भयावह और संदेहास्पद बना दिया है। यह सिर्फ एक हादसा है या फिर सच को दफनाने की साजिश, यही सवाल अब केंद्र में है।
डॉ. शेल्के कोई आम गवाह नहीं थे। शिवनिक ट्रस्ट के उपाध्यक्ष के रूप में वे बाबा के बेहद करीब थे और अंदरूनी गतिविधियों से वाकिफ थे। ऐसे व्यक्ति की अचानक मौत, वह भी ऐसे समय पर जब केस निर्णायक मोड़ पर हो सकता था, महज “संयोग” मान लेना सहज नहीं लगता। यही वजह है कि विपक्षी नेताओं ने इसे सीधे-सीधे साजिश बताया है और सत्ता पर सवाल खड़े किए हैं।
हालांकि, भावनाओं और शक के आधार पर निष्कर्ष निकालना खतरनाक हो सकता है। भारत में सड़क दुर्घटनाएं दुर्भाग्यवश आम हैं और समृद्धि मार्ग जैसे हाई-स्पीड कॉरिडोर पर हादसे कोई असामान्य बात नहीं हैं। तेज रफ्तार, ड्राइविंग में चूक या तकनीकी खराबी—ये सभी कारण किसी भी दुर्घटना को जन्म दे सकते हैं। इसलिए बिना ठोस सबूत के इसे “हत्या” घोषित करना भी उतना ही गैर-जिम्मेदाराना होगा।
लेकिन दूसरी तरफ, इस केस की पृष्ठभूमि साधारण नहीं है। बाबा अशोक खैरात पर सिर्फ व्यक्तिगत अपराध के आरोप नहीं हैं, बल्कि कथित सेक्स रैकेट और प्रभावशाली लोगों के संरक्षण जैसी बातें भी सामने आई हैं। ऐसे में गवाहों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठना लाजिमी है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि भारत में गवाहों की संदिग्ध मौत कोई नई बात नहीं है। कई हाई-प्रोफाइल मामलों में अहम गवाह या तो मुकर जाते हैं या रहस्यमयी परिस्थितियों में जान गंवा देते हैं, जिससे न्याय प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सीधा प्रहार होता है।
इस पूरे घटनाक्रम में जांच एजेंसियों की भूमिका निर्णायक है। यदि यह सच में एक दुर्घटना है तो इसकी पारदर्शी और वैज्ञानिक जांच—सीसीटीवी फुटेज, फॉरेंसिक रिपोर्ट, कॉल डिटेल्स—जनता के सामने लाई जानी चाहिए। लेकिन अगर इसमें किसी भी तरह की साजिश की बू आती है तो उसे दबाने की बजाय उजागर करना ही न्याय का तकाजा है।
आखिरकार, यह मामला सिर्फ एक बाबा या एक गवाह की मौत का नहीं रह गया है। यह उस व्यवस्था का आईना है, जहां कभी-कभी सच बोलने की कीमत जान देकर चुकानी पड़ती है। साफ है, जब तक जांच पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता से नहीं होती, तब तक यह सवाल पीछा नहीं छोड़ेंगे—क्या यह एक हादसा था या फिर सच को हमेशा के लिए खामोश करने की सुनियोजित कोशिश?