कोलकाता, 21 मार्च।
उत्तर 24 परगना जिले का नोआपाड़ा विधानसभा क्षेत्र 2026 के चुनाव में एक बार फिर महत्वपूर्ण सीट बन गया है। तेजी से शहरीकरण, मेट्रो कनेक्टिविटी और बदलती जनसांख्यिकी के कारण यह सीट अब सिर्फ विधानसभा चुनाव की नहीं बल्कि कोलकाता महानगर के राजनीतिक रुझान का भी संकेत देती है। इस बार सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस, भाजपा और वाम दलों के बीच त्रिकोणीय मुकाबला है, लेकिन असली लड़ाई तृणमूल और भाजपा के बीच ही मानी जा रही है।
इस बार तृणमूल ने छात्र इकाई के प्रदेश अध्यक्ष तृणांकुर भट्टाचार्य को उम्मीदवार बनाया है, जबकि भाजपा ने बैरकपुर क्षेत्र से मजबूत पकड़ रखने वाले पूर्व सांसद अर्जुन सिंह को उतारा है। वाम मोर्चा ने गार्गी चटर्जी को मैदान में उतारकर अपने पारंपरिक वोट बैंक को बनाए रखने की कोशिश की है। अर्जुन सिंह ने दावा किया कि भ्रष्टाचार और चोरी के कारण तृणमूल को हार का सामना करना पड़ेगा। तृणांकुर भट्टाचार्य ने भाजपा की नफरत की राजनीति को विफल बताया, जबकि गार्गी चटर्जी ने कहा कि जनता को नया विकल्प चाहिए।
इतिहास में देखें तो 1957 में बनी इस सीट पर वाम दलों का दबदबा रहा और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने आठ बार जीत दर्ज की। 2001 में तृणमूल ने पहली बार जीत हासिल कर वाम दलों की लगातार जीत का सिलसिला तोड़ा। 2006 में वाम दलों ने आखिरी बार यह सीट जीती। इसके बाद तृणमूल और कांग्रेस ने जीत हासिल की। 2011 में तृणमूल की मंजू बसु ने बड़ी जीत दर्ज की थी, लेकिन 2016 में कांग्रेस के मधुसूदन घोष से हार गई थीं। 2018 के उपचुनाव में तृणमूल ने सुनील सिंह को उतारा, जिन्होंने रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज की। 2021 में मंजू बसु ने भाजपा के सुनील सिंह को हराकर सीट वापस हासिल की।
नोआपाड़ा सीट की खासियत यह रही कि विधानसभा और लोकसभा चुनावों में रुझान अलग दिखा है। विधानसभा में तृणमूल का प्रदर्शन उतार-चढ़ाव वाला रहा, लेकिन लोकसभा चुनावों में पार्टी को लगातार बढ़त मिली। 2009 से 2024 तक हुए लोकसभा चुनावों में तृणमूल ने बढ़त बनाई, हालांकि 2019 में भाजपा ने कड़ी टक्कर दी। 2024 में तृणमूल ने फिर अपनी बढ़त बढ़ाई।
यह क्षेत्र मुख्य रूप से शहरी है, लगभग 95 प्रतिशत मतदाता शहरी हैं। अनुसूचित जाति के मतदाता 18 प्रतिशत, मुस्लिम 11 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति डेढ़ प्रतिशत हैं। मतदान प्रतिशत में गिरावट का रुझान देखा गया; 2011 में लगभग 83 प्रतिशत मतदान हुआ, जो 2021 में 73 प्रतिशत रह गया। विशेषज्ञ मानते हैं कि शहरी क्षेत्रों में मतदान उदासीनता का असर दिखता है।
2026 में निर्णायक मुद्दों में शहरी सुविधाएं, ट्रैफिक, ड्रेनेज, रोजगार, स्थानीय इंफ्रास्ट्रक्चर और कानून व्यवस्था शामिल हैं। भाजपा एंटी इनकंबेंसी और तृणमूल के खिलाफ माहौल बनाने का प्रयास कर रही है, जबकि तृणमूल संगठन और सरकारी योजनाओं के आधार पर बढ़त बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रही है। संगठनात्मक ताकत और पिछले चुनावों के ट्रेंड को देखते हुए तृणमूल को शुरुआती बढ़त मिलती दिख रही है, लेकिन भाजपा की बैरकपुर औद्योगिक बेल्ट में पकड़ मुकाबला कठिन बना सकती है। वाम दलों के स्थिर वोट प्रतिशत से भी परिणाम प्रभावित हो सकते हैं।
कुल मिलाकर नोआपाड़ा 2026 उन सीटों में शामिल है जहां शहरी मतदाता का मूड, उम्मीदवारों की व्यक्तिगत छवि और बूथ स्तर की रणनीति जीत-हार तय करेगी। अगर भाजपा अपने वोट आधार को एकजुट करने में सफल होती है, तो मुकाबला बेहद करीबी हो सकता है।













