केरल में सबरीमाला विवाद और स्वर्ण चोरी प्रकरण ने राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं और एनएसएस का नरम रुख भविष्य की राजनीति में संतुलन की नई दिशा दिखा रहा है।
केरल, 04 अप्रैल।
केरल की राजनीति लंबे समय से वैचारिक ध्रुवीकरण, सामाजिक संगठनों के प्रभाव और धार्मिक-सांस्कृतिक मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। हाल के वर्षों में सबरीमाला मंदिर से जुड़े दो प्रमुख घटनाक्रम—महिलाओं के प्रवेश का विवाद और स्वर्ण चोरी प्रकरण—ने राज्य की राजनीति को नई दिशा दी है। इन दोनों मामलों में वामपंथी सरकार को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, वहीं नायर सर्विस सोसाइटी (एनएसएस) की भूमिका ने राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित किया।
सबरीमाला में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश को लेकर जब विवाद खड़ा हुआ, तब एनएसएस ने सबसे पहले शांतिपूर्ण विरोध की राह अपनाने का आह्वान किया। ‘नामजप घोषयात्रा’ के रूप में शुरू हुआ यह विरोध धीरे-धीरे व्यापक आंदोलन में बदल गया, जिसमें संघ परिवार से जुड़े संगठनों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली। इस दौरान तीर्थयात्रा का माहौल भी तनावपूर्ण रहा और पुलिस तथा श्रद्धालुओं के बीच टकराव की घटनाएं सामने आईं।
इस पूरे घटनाक्रम का राजनीतिक असर भी स्पष्ट रूप से दिखा। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) को भारी नुकसान उठाना पड़ा और वह 20 में से 19 सीटों पर पराजित हुआ। यह परिणाम इस बात का संकेत था कि धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं की अनदेखी राजनीतिक रूप से महंगी पड़ सकती है।
हालांकि, 2025 तक आते-आते पिनराई विजयन सरकार ने अपनी रणनीति में बदलाव के संकेत दिए। ‘ग्लोबल अय्यप्पा संगमम’ का आयोजन इसी दिशा में एक प्रयास के रूप में देखा गया, जिसमें देश-विदेश से हजारों प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया। यह आयोजन न केवल सरकार की छवि सुधारने का प्रयास था, बल्कि हिंदू संगठनों के साथ संवाद स्थापित करने की कोशिश भी थी।
इस बीच, जब सबरीमाला स्वर्ण चोरी का मामला सामने आया, तब अपेक्षा थी कि एनएसएस फिर से आक्रामक रुख अपनाएगा। लेकिन इस बार संगठन ने अपेक्षाकृत शांत और संयमित प्रतिक्रिया दी। जहां विपक्ष और अन्य संगठनों ने सरकार पर तीखे आरोप लगाए, वहीं एनएसएस ने इस मामले को न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रिया पर छोड़ने का निर्णय लिया। यह बदलाव केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन का संकेत भी है।
एनएसएस के महासचिव जी. सुकुमारन नायर का यह कहना कि सरकार ने पिछली गलतियों से सीख ली है और मामला अभी न्यायालय में लंबित है, इस बात को दर्शाता है कि संगठन अब टकराव के बजाय संतुलन की नीति अपना रहा है। इसी तरह स्वर्ण चोरी प्रकरण पर उनका यह रुख कि दोषियों को सजा दिलाना सरकार और न्यायालय की जिम्मेदारी है, संगठन की बदली हुई सोच को रेखांकित करता है।
केरल में एनएसएस, जो आबादी का लगभग 12 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करता है, उसकी राजनीतिक भूमिका हमेशा निर्णायक रही है। लेकिन 2026 तक आते-आते इसके रुख में जो नरमी आई है, वह राज्य की राजनीति में नए समीकरणों की ओर इशारा करती है। खासतौर पर यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि संगठन ने भाजपा-आरएसएस के साथ खुलकर तालमेल नहीं किया है, जिससे उसके समर्थकों के एक वर्ग में असंतोष भी देखा जा रहा है।
वास्तव में, केरल की राजनीति अब केवल पारंपरिक ‘लाल बनाम भगवा’ के द्वंद्व तक सीमित नहीं रही। इसमें सामाजिक संगठनों की भूमिका, उनकी रणनीतिक चुप्पी और बदलती प्राथमिकताएं भी महत्वपूर्ण कारक बन गई हैं। एनएसएस का यह बदला हुआ रुख संकेत देता है कि भविष्य की राजनीति अधिक संतुलित, संवाद आधारित और परिस्थिति-सापेक्ष हो सकती है।
यह स्पष्ट है कि केरल में राजनीतिक रंग बदल रहे हैं। जहां एक ओर वामपंथी सरकार अपनी छवि सुधारने और समुदायों के साथ रिश्ते मजबूत करने की कोशिश कर रही है, वहीं सामाजिक संगठन भी अपने रुख में लचीलापन ला रहे हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में ‘लाल’ और ‘भगवा’ के बीच यह संतुलन किस दिशा में जाता है और राज्य की राजनीति को किस रूप में प्रभावित करता है।