भोपाल, 17 जून।
भोपाल के हलालपुरा स्थित पटाखा सेंटर में लगी आग ने फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि शहरों के बीच बारूद का कारोबार आखिर कब तक चलता रहेगा। यह समस्या केवल भोपाल तक सीमित नहीं, बल्कि इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर समेत मध्यप्रदेश के अधिकांश बड़े शहर इसी खतरे के साये में जी रहे हैं। आबादी वाले क्षेत्रों में संचालित पटाखा बाजार प्रशासनिक लापरवाही का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
हलालपुरा की घटना ने स्पष्ट कर दिया कि यदि आबादी और विस्फोटक सामग्री के कारोबार के बीच सुरक्षित दूरी नहीं बनाई गई, तो हरदा जैसी त्रासदी किसी भी शहर में दोहराई जा सकती है। दुर्भाग्य यह है कि शासन-प्रशासन अब भी इस गंभीर मुद्दे पर ठोस कदम उठाने में असफल रहा है।
भोपाल में पटाखा बाजार को शहर से बाहर स्थानांतरित करने की प्रक्रिया इसका उदाहरण है। एक वर्ष पूर्व व्यापारियों को निर्देश दिए गए, लेकिन आज तक वैकल्पिक भूमि चिह्नित नहीं हो सकी। नतीजतन व्यापारी न्यायालयों से राहत प्राप्त कर रहे हैं और स्थिति यथावत बनी हुई है।
चौक बाजार और संत नगर जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में अब भी पटाखा गोदाम संचालित हैं। विस्फोटक अधिनियम, 1884 तथा पटाखा नियम, 2008 के अनुसार रिहायशी क्षेत्रों, स्कूलों, अस्पतालों और पेट्रोल पंपों से सुरक्षित दूरी अनिवार्य है, लेकिन व्यवहार में इन नियमों का पालन नहीं हो रहा। अग्निशमन विभाग की एनओसी भी कई बार केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह जाती है।
समाधान स्पष्ट है—आबादी के बीच संचालित पटाखा गोदामों का सुरक्षा ऑडिट कर उन्हें तत्काल हटाया जाए, शहर से बाहर सुरक्षित एक्सप्लोसिव जोन विकसित किए जाएं, लाइसेंस प्रक्रिया पारदर्शी बने और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो। पटाखा बाजार रोजगार देता है, पर जान की कीमत पर नहीं। जनता की सुरक्षा से बड़ा कोई त्योहार नहीं हो सकता।













