नई दिल्ली, 17 जून।
सुप्रीम कोर्ट ने सेवा कानून में अनुशासनात्मक कार्यवाही को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि “कदाचार साबित हुआ या नहीं, यह लेबर कोर्ट तय करेगा। लेकिन कदाचार साबित होने के बाद कौन-सी सज़ा दी जाए, यह तय करने का अधिकार सक्षम अनुशासनात्मक प्राधिकारी का है।” यह फैसला महाराष्ट्र राज्य विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड की कर्मचारी सुरेखा डोमाजी बेले के मामले में आया है।
मामले की पृष्ठभूमि:याचिकाकर्ता सुरेखा डोमाजी बेले महाराष्ट्र राज्य विद्युत वितरण कंपनी में अपर डिवीजन क्लर्क थीं और उन्होंने 20 वर्ष से अधिक सेवा दी थी। सितंबर 2006 में अनुशासनहीनता, अवज्ञा और दस्तावेजों में हेरफेर के आरोपों पर उन्हें निलंबित कर दिया गया। विभागीय जांच एकतरफा हुई और अप्रैल 2008 में उन्हें बर्खास्तगी का कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। लेबर कोर्ट ने इस आंतरिक जांच को अनुचित और विकृत घोषित कर दिया।
औद्योगिक न्यायालय ने 2015 में मामले को रिमांड कर प्रबंधन को लेबर कोर्ट के समक्ष नए सिरे से साक्ष्य प्रस्तुत कर कदाचार साबित करने की अनुमति दी। प्रकरण में पुनः सुनवाई के बाद जून 2017 में लेबर कोर्ट ने कदाचार साबित माना।
इसके तुरंत बाद जुलाई 2017 में अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने 2008 के पुराने, जवाब-रहित कारण बताओ नोटिस का हवाला देते हुए बर्खास्तगी का आदेश जारी कर दिया और 11 वर्ष की निलंबन अवधि को भी अलग सज़ा माना। लेबर कोर्ट, औद्योगिक न्यायालय और बॉम्बे हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?1. कदाचार साबित करने का चरण अलग है:
पीठ ने ‘वर्कमेन ऑफ फायरस्टोन टायर एंड रबर कंपनी’ के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि यदि घरेलू जांच दोषपूर्ण है, तो नियोक्ता लेबर कोर्ट के समक्ष नए सिरे से साक्ष्य प्रस्तुत कर आरोप साबित कर सकता है। लेकिन यह सिद्धांत केवल कदाचार साबित करने के चरण तक सीमित है।
2. सज़ा तय करने के लिए नए सिरे से विचार आवश्यक:
कोर्ट ने कहा कि लेबर कोर्ट द्वारा कदाचार साबित होने के बाद अनुशासनात्मक प्राधिकारी की यह वैधानिक जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती कि वह अंतिम सज़ा पर स्वतंत्र रूप से विचार करे। वह पहले की रद्द हो चुकी जांच पर आधारित पुराने कारण बताओ नोटिस पर यांत्रिक रूप से कार्रवाई नहीं कर सकता।
3. शमनकारी कारकों पर विचार करना अनिवार्य:
सज़ा की मात्रा तय करते समय प्राधिकारी को कर्मचारी की सेवा अवधि, पिछला रिकॉर्ड, वित्तीय हानि या बेईमानी की अनुपस्थिति, आयु तथा क्या कम सज़ा से न्याय हो सकता है, इन सभी पहलुओं पर सचेत रूप से विचार करना होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि बेले के मामले में भ्रष्टाचार, नैतिक अधमता या आर्थिक नुकसान का आरोप नहीं था, फिर भी 21 वर्ष की बेदाग सेवा और 11 वर्ष के लंबे निलंबन पर विचार नहीं किया गया।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश:सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया। निलंबन अवधि को अलग सज़ा मानने का निर्देश निष्प्रभावी होगा। महाराष्ट्र राज्य विद्युत वितरण कंपनी को मार्च 2007 से जुलाई 2017 तक की अवधि के लिए अपीलकर्ता को निर्वाह भत्ता देने का आदेश दिया गया।
चूंकि बेले सेवानिवृत्ति की आयु पार कर चुकी हैं, इसलिए कोर्ट ने महाराष्ट्र राज्य विद्युत वितरण कंपनी को तीन माह के भीतर सज़ा पर नया आदेश पारित करने का निर्देश दिया, जिसमें उनकी सेवा और रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए सेवानिवृत्ति लाभ निर्धारित किए जाएं।
यह फैसला स्पष्ट करता है कि विभागीय जांच रद्द होने के बाद लेबर कोर्ट के निष्कर्ष ही नए सिरे से सज़ा तय करने का आधार बनेंगे। केवल न्यायिक पुष्टि को बर्खास्तगी का स्वचालित आदेश नहीं माना जा सकता। अनुशासनात्मक प्राधिकारी को प्रत्येक मामले में विवेकपूर्ण ढंग से कर्मचारी के संपूर्ण सेवा-रिकॉर्ड और परिस्थितियों का मूल्यांकन कर ही दंड निर्धारित करना होगा।













