संपादकीय
17 Jun, 2026

जंगल से मंडी तक : मध्यप्रदेश में वनौषधियों की नई क्रांति वनवासियों की आय बढ़ाने का सरकारी संकल्प

मध्य प्रदेश सरकार ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए 25 नई वनौषधियों को कृषि उपज मंडियों में व्यापार के लिए अधिसूचित किया है, जिससे अब बिचौलियों का एकाधिकार समाप्त होगा और वनों में रहने वाले लाखों आदिवासियों को उनकी उपज का सही दाम मिल सकेगा।

भोपाल, 17 जून।

मध्यप्रदेश की पहचान कभी टाइगर स्टेट तो कभी हृदय प्रदेश के रूप में रही है। अब यह राज्य वनौषधि प्रदेश बनने की राह पर है। राज्य सरकार ने एक ऐतिहासिक अधिसूचना जारी कर 25 नई वनौषधियों को कृषि उपज मंडियों में व्यापार के लिए अधिसूचित किया है। इसके साथ ही मंडियों में बिकने वाली वनौषधियों की संख्या 66 से बढ़कर 91 हो गई है। यह कदम केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि जंगलों में रहने वाले लाखों आदिवासियों और वनवासियों के जीवन में आर्थिक क्रांति की शुरुआत है।

हरियाली से खुशहाली की ओर बढ़ता यह कदम ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ का सबसे हरा उदाहरण है। यह पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और आदिवासी कल्याण तीनों को जोड़ता है। पेड़ कटे बिना कमाई और जंगल बचे तो जीवन बचे। सरकार ने दरवाजा खोल दिया है, अब आवश्यकता है कि वन विभाग, मंडी बोर्ड, आयुष विभाग और जनजातीय कल्याण विभाग मिलकर कार्य करें। ग्राम सभाओं को मजबूत किया जाए और एमएसपी की तर्ज पर वनौषधियों का न्यूनतम मूल्य तय हो।

मध्यप्रदेश के जंगलों में सदियों से सेहत का खजाना छिपा था, अब सरकारी पहल से उसके लिए बाजार का रास्ता खुला है। यदि यह पहल सफल रही तो जंगल रोने की नहीं, रोजगार की जगह बनेंगे और तब सही मायने में कहा जाएगा—‘एमपी अजब है, सबसे गजब है।’

मंडी बोर्ड के अनुसार सरकार का लक्ष्य कृषकों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य दिलाना है। इसी दिशा में 25 नई वनौषधियों को मंडियों में नीलामी के लिए अधिसूचित किया गया है। इनमें चिया बीज, अकरकरा, हिंगोट, जामुन, कंठकारी, भृंगराज, टेसू फूल, बबूल फली, एलोवेरा पत्ती, गोखरू, नागरमोथा, निर्गुणी, अमरबेल, सहजन पत्ती, बिच्छूफल, नीलगिरी, इंद्रायण फल, हरसिंगार पत्ती, सनाय पत्ती और सनाय बीज शामिल हैं।

अब तक वन क्षेत्रों में रहने वाले लोग इन औषधियों को एकत्र कर बिचौलियों को औने-पौने दाम पर बेच देते थे। न सही तौल होती थी और न पारदर्शी मूल्य। मंडियों में नीलामी की व्यवस्था होने से अब उन्हें प्रतिस्पर्धी मूल्य, सही तौल और पारदर्शी व्यापार का लाभ मिलेगा। यदि विक्रेता मूल्य से संतुष्ट नहीं होगा तो वह सौदा निरस्त भी कर सकेगा।

मध्यप्रदेश देश के लगभग 25 प्रतिशत वन क्षेत्र का धनी है। बस्तर से लेकर बैतूल और मंडला से लेकर श्योपुर तक फैले जंगलों में 500 से अधिक औषधीय पौधे पाए जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया की 80 प्रतिशत आबादी प्राथमिक स्वास्थ्य के लिए पारंपरिक औषधियों पर निर्भर है। वैश्विक हर्बल बाजार 2030 तक 10 लाख करोड़ रुपये का हो जाएगा, पर इस प्राकृतिक संपदा पर बैठे मध्यप्रदेश के वनवासी अब तक गरीबी से जूझते रहे।

कारण स्पष्ट था। बाजार नहीं था, वनौषधियों को कृषि उपज का दर्जा नहीं मिला था और इनके व्यापार में लाइसेंस, परमिट तथा बिचौलियों का जाल था। मंडियों में स्थान नहीं होने से संग्राहकों को उचित मूल्य नहीं मिल पाता था। नीमच मंडी में हाल ही में चिरायता बीज 6.50 लाख रुपये प्रति क्विंटल बिका, जबकि जंगल से उसे एकत्र करने वाले को 10 हजार रुपये भी मुश्किल से मिलते थे। नई अधिसूचना इसी खाई को पाटने का प्रयास है।

सरकारी पहल के तीन बड़े लाभ दिखाई देते हैं। पहला, आय बढ़ेगी। कृषि विपणन बोर्ड के अनुसार प्रदेश की मंडियों में आने वाली वनौषधियों से प्रतिवर्ष 20 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व प्राप्त होता है। नई 25 औषधियों के जुड़ने से यह आंकड़ा 50 करोड़ रुपये पार कर सकता है।

दूसरा, पलायन रुकेगा। जब जंगल से ही सम्मानजनक आमदनी होगी तो युवा शहरों की ओर नहीं भागेंगे। तीसरा, संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा। जब औषधीय पौधे कमाई का जरिया बनेंगे तो वनवासी स्वयं जंगलों की रक्षा करेंगे।

राज्य सरकार ने वन धन विकास केंद्र और ट्राइफेड के साथ मिलकर 275 से अधिक केंद्र स्थापित किए हैं, जहां संग्रहण, ग्रेडिंग, पैकेजिंग और मूल्य संवर्धन का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। शहडोल की बैगा महिलाएं अब महुआ से लड्डू और आंवला से कैंडी बनाकर ऑनलाइन बेच रही हैं। यह बदलाव मंडी अधिसूचना से और तेज होगा।

मंडियों में अधिसूचित होने का अर्थ है कानूनी मान्यता। अब फार्मा कंपनियां, आयुर्वेदिक दवा निर्माता और निर्यातक सीधे मंडी से नीलामी के माध्यम से खरीद सकेंगे। गुणवत्ता प्रमाणित होने पर विदेशी बाजार भी खुलेंगे। डिंडौरी का शहद, पातालकोट की हर्बल चाय और अमरकंटक की जड़ी-बूटियों को एमपी ब्रांड की पहचान मिलेगी।

आयुष मंत्रालय ने 2023 में ‘वन नेशन, वन हर्बल स्टैंडर्ड’ की शुरुआत की है। मंडियों में आने वाली हर वनौषधि की जांच होगी, जिससे मिलावट रुकेगी और अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन सुनिश्चित होगा। ई-नाम पोर्टल से जुड़ने पर देशभर का खरीदार एक क्लिक पर बोली लगा सकेगा और किसान को सर्वोच्च मूल्य प्राप्त होगा।

हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सबसे बड़ी चुनौती जागरूकता की है। वनवासियों को यह जानकारी देनी होगी कि अब उनकी जड़ी-बूटियां मंडी में बिक सकती हैं। ग्राम पंचायत स्तर पर शिविर आयोजित किए जाएं। गुणवत्ता नियंत्रण के लिए तुड़ाई का सही समय, वैज्ञानिक तरीके से सुखाने और भंडारण का प्रशिक्षण आवश्यक है। कृषि विश्वविद्यालयों को वनौषधि संबंधी पाठ्यक्रम शुरू करने चाहिए।

संग्रहण से मंडी तक पहुंचने में लगने वाले समय के दौरान छोटे संग्राहकों को वित्तीय सहायता मिले, इसके लिए शून्य ब्याज पर अग्रिम भुगतान की व्यवस्था हो। साथ ही मूल्य संवर्धन के लिए प्रत्येक ब्लॉक में मिनी हर्बल प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित की जाए।

मध्यप्रदेश सरकार का लक्ष्य वर्ष 2028 तक वनौषधि व्यापार को 1000 करोड़ रुपये तक पहुंचाना है। यह असंभव नहीं है। छत्तीसगढ़ अपने हर्बल ब्रांड के माध्यम से 300 करोड़ रुपये का कारोबार कर चुका है, जबकि मध्यप्रदेश के पास उससे कहीं अधिक वन संपदा है।

जब बैतूल का गोंड युवा चिया बीज बेचकर ड्रोन खरीदेगा, मंडला की भारिया महिला एलोवेरा का जूस बनाकर दुबई भेजेगी और श्योपुर का सहरिया कंठकारी का काढ़ा ऑनलाइन बेचेगा, तब यह केवल आय नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की नई कहानी होगी।

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