बलरामपुर, 17 जून।
सनातन हिंदू परंपरा में गाय को धर्म, संस्कृति, समृद्धि और करुणा का साक्षात प्रतीक माना गया है। हमारे वेदों, पुराणों और प्राचीन धर्मग्रंथों में गौसेवा को मानव कल्याण तथा लोकमंगल का मुख्य आधार बताया गया है। इसी महान आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत रूप उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में स्थित सुप्रसिद्ध शक्तिपीठ देवीपाटन में देखने को मिलता है, जहां मां भगवती की शक्ति साधना के साथ-साथ गौसेवा को भी विशेष स्थान दिया गया है। ऐसी मान्यता है कि महायोगी गुरु गोरक्षनाथ के काल से ही यहां गौसेवा की पावन परंपरा अविरल रूप से चली आ रही है, जिसे आज भी पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ निभाया जा रहा है।
विश्व के 51 शक्तिपीठों में सर्वोपरि स्थान रखने वाला देवीपाटन धाम शक्ति उपासना का एक बड़ा केंद्र है। यहाँ पूरे साल मां पाटेश्वरी के पावन दर्शनों के लिए देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु आते हैं। मंदिर में दर्शन-पूजन करने के पश्चात बड़ी संख्या में भक्त मंदिर परिसर में ही स्थित विशाल गौशाला में जाते हैं और गौसेवा का पुण्य लाभ कमाते हैं। कोई गायों को हरा चारा खिलाता है, तो कोई उन्हें गुड़ और मिष्ठान अर्पित करता है। श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि निष्काम भाव से की गई गौसेवा से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और कष्टों का निवारण होता है।

देवीपाटन मंदिर की यह गौशाला वर्तमान में श्रद्धालुओं के आकर्षण का एक प्रमुख केंद्र बन चुकी है। इस समय गौशाला में विभिन्न उन्नत नस्लों की 250 से अधिक गायें, बछड़े और बछियाएं पूरी तरह से संरक्षित हैं। इनमें 'कामधेनु' गाय विशेष रूप से भक्तों की अगाध आस्था का केंद्र बनी हुई है। मंदिर प्रबंधन की ओर से समस्त गौवंश की देखभाल के लिए बेहद पुख्ता और आधुनिक इंतजाम किए गए हैं। उनके पौष्टिक भोजन, उत्तम स्वास्थ्य और दैनिक स्वच्छता का नियमित रूप से विशेष ध्यान रखा जाता है ताकि उन्हें एक सुरक्षित और स्वस्थ माहौल मिल सके।
देवीपाटन पीठ के पीठाधीश्वर महंत मिथिलेश नाथ योगी महाराज स्वयं प्रतिदिन सुबह और शाम नियमपूर्वक गौशाला पहुंचते हैं। जैसे ही वे गौशाला के भीतर प्रवेश करते हैं, गायें और नन्हे बछड़े उनके प्रति अपना प्रेम जताने के लिए चारों ओर इकट्ठा हो जाते हैं। महंत महाराज अपने हाथों से उन्हें दुलारते हैं, मिष्ठान्न खिलाते हैं और स्नेहपूर्वक उनके नाम लेकर पुकारते हैं। योगी महाराज की आवाज कानों में पड़ते ही सभी गौवंश रंभाने लगते हैं और उनकी तरफ दौड़ पड़ते हैं। मनुष्य और बेजुबान गौवंश के बीच उमड़ने वाले प्रेम, सेवा और गहरी संवेदना का यह अलौकिक दृश्य यहां आने वाले श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर देता है।
पीठाधीश्वर महंत मिथिलेश नाथ योगी ने इस संबंध में बताया कि नाथ संप्रदाय की परंपरा में गौसेवा को लोककल्याण और धार्मिक साधना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग स्वीकार किया गया है। महायोगी गुरु गोरक्षनाथ ने जहां संसार को योग, अध्यात्म और मानव सेवा का दिव्य संदेश दिया, वहीं गौरक्षा व गौसेवा को भी सुदृढ़ समाज के लिए परम आवश्यक बताया। देवीपाटन पीठ पर सदियों पुरानी उसी गौरवशाली परंपरा का निर्वहन पूरी निष्ठा से आज भी किया जा रहा है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस सिद्ध शक्तिपीठ देवीपाटन की स्थापना स्वयं महायोगी गुरु गोरक्षनाथ ने की थी। यहां उनके द्वारा प्रज्वलित की गई अखंड धूनी आज भी निरंतर जल रही है। इसी महान आध्यात्मिक विरासत के साथ-साथ गौसेवा की यह अनुपम परंपरा भी युगों-युगों से चली आ रही है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी जब-जब देवीपाटन धाम के प्रवास पर आते हैं, तो वे इस गौशाला में जाकर गौवंश को अपने हाथों से चारा व गुड़ खिलाकर गौसेवा करना कभी नहीं भूलते।
धार्मिक आस्था, निस्वार्थ सेवा, करुणा और जीव मात्र के प्रति दयाभाव का संदेश देने वाली यह देवीपाटन गौशाला आज केवल गौवंशों के संरक्षण और संवर्धन का केंद्र मात्र नहीं है, बल्कि समाज को संवेदनशील, करुणावान और संस्कारित बनाने वाली एक प्रेरणादायी पाठशाला के रूप में स्थापित हो चुकी है। यहाँ आने वाला प्रत्येक श्रद्धालु शक्ति की आराधना के साथ-साथ गौसेवा के इस परम महत्व को अपने अंतर्मन में आत्मसात कर लौटता है।














