खूंटी, 17 जून।
झारखंड के खूंटी जिले के जरियागढ़ में स्थित उत्क्रमित उच्च विद्यालय की सूरत इन दिनों बेहद बदहाल और डरावनी हो चुकी है। स्कूल की इमारत पूरी तरह जर्जर होकर खंडहर में तब्दील होने की कगार पर है, लेकिन बुनियादी ढांचे और कमरों की घोर किल्लत के चलते यहां हर रोज सैकड़ों नौनिहाल अपनी जान हथेली पर रखकर पढ़ाई करने को विवश हैं। विद्यालय का यह खस्ताहाल ढांचा न केवल मासूम छात्र-छात्राओं बल्कि वहां तैनात शिक्षकों और बच्चों के अभिभावकों के लिए भी हर पल एक मानसिक तनाव और गहरे खौफ का सबब बना हुआ है।
स्कूल के हालात इस कदर खराब हैं कि कई क्लासरूम की छतों से आए दिन प्लास्टर और कंक्रीट का मलबा भरभरा कर नीचे गिरता रहता है। कई कमरों की छतों की ऊपरी परत पूरी तरह उखड़ चुकी है और अंदर जंग खा चुकी लोहे की सरिया साफ नजर आने लगी है, जो यह बताने के लिए काफी है कि भवन कभी भी ताश के पत्तों की तरह ढह सकता है। स्कूल के शिक्षकों ने बताया कि जब वे बच्चों को पढ़ा रहे होते हैं, तो उनका ध्यान ब्लैकबोर्ड से ज्यादा छत पर होता है कि कहीं कोई बड़ा हादसा न हो जाए। पूर्व में भी चलती क्लास के दौरान छत का हिस्सा टूटकर नीचे गिर चुका है, जिससे बच्चों के भीतर इस कदर डर बैठ गया है कि वे स्कूल आने से भी कतराने लगे हैं।
मौसम में जरा से बदलाव या खासकर बरसात के दिनों में स्थिति और भी ज्यादा नारकीय हो जाती है। कक्षाओं के साथ-साथ मुख्य प्रशासनिक कार्यालय की छत भी जगह-जगह से छलनी हो चुकी है, जिससे बारिश का पानी सीधे अंदर टपकता है। मानसून के दौरान पूरे स्कूल परिसर और कमरों में घुटनों तक पानी जमा हो जाता है, जिससे जरूरी शैक्षणिक दस्तावेज और बच्चों की कापियां-किताबें तक भीग जाती हैं। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी गरीब तबके के छात्र भीगते हुए बैठने और पढ़ने को मजबूर हैं।
गौरतलब है कि इस सरकारी स्कूल में जरियागढ़ और उसके आस-पास के सुदूर ग्रामीण अंचलों के सैकड़ों निर्धन व मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे अपने उज्ज्वल भविष्य का सपना लेकर शिक्षा ग्रहण करने आते हैं। स्थानीय ग्रामीणों में व्यवस्था के खिलाफ भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि यह बदहाली कोई नई बात नहीं है; वर्षों से वे इस स्कूल की मरम्मत या नए कमरों के निर्माण की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन नौकरशाही की सुस्ती के चलते अब तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
स्कूल के प्रधानाचार्य ने पूरी बेबसी जाहिर करते हुए बताया कि उन्होंने अपनी तरफ से कई बार लिखित तौर पर शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों को इस गंभीर समस्या से अवगत कराया है। भवन पूरी तरह डैमेज घोषित होने लायक है और समय-समय पर गिरते मलबे के कारण वे खुद को और बच्चों को असुरक्षित महसूस करते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि क्षेत्र में दूसरा कोई विकल्प न होने और कमरों की कमी के कारण वे बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह बंद नहीं कर सकते, इसलिए मजबूरी में इस भारी जोखिम के बीच भी कक्षाएं संचालित करनी पड़ रही हैं।
अब स्कूल प्रबंधन समिति (एसएमसी), पीड़ित अभिभावकों और प्रबुद्ध ग्रामीणों ने एक सुर में शिक्षा विभाग और राज्य सरकार से इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई है। उन्होंने मांग की है कि यहां पढ़ने वाले बच्चों के जीवन की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए अविलंब नए स्कूल भवन की स्वीकृति दी जाए या फिर इस जर्जर ढांचे का युद्धस्तर पर जीर्णोद्धार कराया जाए। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते प्रशासन की कुंभकर्णी नींद नहीं खुली, तो यहां किसी भी दिन कोई बड़ी अप्रिय घटना घट सकती है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन की होगी।














