साहब की कलेक्टरी का सपना अब मंत्रालय की गलियों में सबसे पुरानी फाइलों में गिना जाने लगा है। बैच के साथी जिले नापते-नापते कई उपलब्धियां बटोर चुके हैं और साहब अब भी उम्मीद की गठरी कंधे पर टांगे बैठे हैं।
हां, एक बड़े साहब के आश्वासन ने उम्मीद का दिया अभी बुझने नहीं दिया है। अब देखना यह है कि पहले आदेश निकलता है या इंतजार का धैर्य जवाब देता है।














