एक महत्वपूर्ण कुर्सी के लिए साहब ने जिस दरवाजे पर सबसे ज्यादा भरोसा किया था, वहीं से आखिरी वक्त पर ताला मिल गया। जिस भरोसे पर पूरा महल खड़ा किया था, वही नींव खिसक गई।
जिस कुर्सी पर बैठने के सपने देख रहे थे, वहां कोई और विराजमान हो गया। हालांकि साहब अभी भी मायूस नहीं हैं। उनका कहना है कि राजनीति और नौकरशाही में अगला स्टेशन कभी भी आ सकता है।














