नई दिल्ली, 25 जून।
ईरान-इजराइल संघर्ष ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। तेल और गैस के दाम बढ़ते ही भारतीय अर्थव्यवस्था की धड़कन तेज हो जाती है। इसका कारण स्पष्ट है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल और 50 प्रतिशत गैस आयात करता है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर तनाव बढ़ने का सीधा असर तेल की कीमतों पर पड़ता है। तेल महंगा होते ही पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ती हैं, परिवहन लागत बढ़ती है और महंगाई का दबाव पैदा होता है। यही कारण है कि ऊर्जा सुरक्षा अब राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने तेल पर निर्भरता कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाए हैं। एक ओर जैव ईंधन, इथेनॉल मिश्रण और ग्रीन हाइड्रोजन पर काम हो रहा है, तो दूसरी ओर इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग तेजी से बढ़ रही है। कुछ वर्ष पहले तक ईवी को महंगा विकल्प माना जाता था, लेकिन अब कई कंपनियां अपेक्षाकृत किफायती मॉडल बाजार में उतार रही हैं। चार्जिंग स्टेशन बढ़ रहे हैं, बैटरी की रेंज बेहतर हुई है और चार्जिंग का समय भी कम हुआ है। बढ़ती ईंधन कीमतों के बीच उपभोक्ता स्वाभाविक रूप से ईवी की ओर आकर्षित हो रहा है।
भारत ने पिछले पांच दशकों में कई तेल संकट देखे हैं। हर बार महंगाई और आर्थिक दबाव बढ़ा, लेकिन इस बार विकल्प मौजूद हैं। सरकार ने 2030 तक इलेक्ट्रिक वाहनों का दायरा बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। इससे तेल आयात पर निर्भरता घटेगी और प्रदूषण भी कम होगा।
हालांकि चुनौतियां भी हैं। बैटरी निर्माण के लिए आवश्यक खनिजों की उपलब्धता सीमित है और चार्जिंग ढांचा अभी पर्याप्त नहीं है। इन कमियों को दूर करना जरूरी है। तेल का दौर अभी समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन उस पर अत्यधिक निर्भरता का दौर अवश्य ढलान पर है। ईरान-इजराइल संघर्ष ने फिर याद दिलाया है कि ऊर्जा आत्मनिर्भरता ही आर्थिक स्वतंत्रता की सबसे मजबूत आधारशिला है।













