किसानों के नाम पर आया बजट भी बड़ा दिलदार निकला। पैसा एक विभाग की झोली में आया और खर्च करने की जिम्मेदारी दूसरे के कंधों पर डाल दी गई।
अब अधिकारी समझ नहीं पा रहे कि हिसाब किसे देना है और जवाब किससे लेना है। सरकारी खजाने ने भी शायद पहली बार सोचा होगा कि आखिर मेरा असली मालिक कौन है।














