नई दिल्ली, 25 जून।
लोकतंत्र का गणित सीधा है - जितनी आबादी, उतना प्रतिनिधित्व। पर भारत की राजनीति इस गणित को हर चुनाव में तोड़ देती है। देश की आधी आबादी महिलाएं हैं, पर सदन की कुर्सियों तक उनकी पहुंच आज भी दस प्रतिशत की लक्ष्मण रेखा पार नहीं कर पाई है। मंचों से नारी शक्ति के नारे गूंजते हैं, महिला सशक्तिकरण का संकल्प दोहराया जाता है, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ से लेकर नारी वंदन तक के वादे किए जाते हैं, पर जब टिकट वितरण की सूची जारी होती है तो तथ्य एक कठोर आईना दिखा देते हैं। वह आईना बताता है कि राजनीतिक दलों की कथनी आसमान छूती है और करनी जमीन पर रेंगती है।
तथ्य बोलते हैं और तथ्य झूठ नहीं बोलते। 2024 के लोकसभा चुनाव में कुल 39,789 उम्मीदवार मैदान में थे। इनमें महिला उम्मीदवारों की संख्या केवल 4,073 रही, यानी कुल उम्मीदवारों का 10.2 प्रतिशत। 543 सीटों वाली लोकसभा में चुनी गई महिला सांसदों की संख्या 74 रही, जो सदन का 13.6 प्रतिशत है। राज्यसभा के 245 सदस्यों में महिला सदस्यों की संख्या लगभग 30 है, यानी करीब 12 प्रतिशत। विधानसभा की तस्वीर और भी धुंधली है। 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के विधानसभा चुनावों में 8,360 उम्मीदवारों में सिर्फ 800 महिलाएं थीं, जो 9.6 प्रतिशत है। चुनी गई महिला विधायकों का औसत 10 से 12 प्रतिशत के बीच सिमटा हुआ है। इसका अर्थ है कि 50 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करने के लिए विधायिकाओं में जगह दसवें हिस्से से भी कम है।
यह आंकड़ा किसी एक दल का नहीं है। भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा और आप सहित सभी प्रमुख दलों का औसत 9 से 13 प्रतिशत के बीच ही रहा है। कथनी और करनी का अंतर संगठन के भीतर और गहरा दिखाई देता है। हर राजनीतिक दल के संविधान में महिलाओं को 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने का दावा दर्ज है, पर जमीनी हकीकत अलग है। प्रदेश अध्यक्ष, जिला अध्यक्ष, राष्ट्रीय प्रवक्ता, चुनाव समिति, टिकट वितरण और स्क्रीनिंग कमेटी जैसे फैसले लेने वाले पदों पर महिलाओं की उपस्थिति नगण्य है। महिला मोर्चा हर दल में है, पर उसका काम प्रायः रैलियों में भीड़ जुटाना और नारे लगवाना भर रह गया है। नीति बनाने का अधिकार, बजट तय करने की ताकत और टिकट वितरण में निर्णायक भूमिका उसे नहीं मिलती। परिणाम यह है कि महिला पार्टी में कार्यकर्ता तो बन जाती है, पर निर्णयकर्ता नहीं बन पाती।
महिला आरक्षण कानून 2023 में संसद से पारित हो चुका है। इसके अनुसार लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा। कानून पारित होने पर सभी दलों ने इसका स्वागत किया, तालियां बजीं और भाषण हुए, पर उसी वर्ष हुए चुनावों में किसी भी राष्ट्रीय दल ने 33 प्रतिशत टिकट नहीं दिए। कानून लागू होने में अभी समय है, लेकिन दलों के पास दशकों का अवसर था कि वे स्वेच्छा से इस लक्ष्य को हासिल कर उदाहरण प्रस्तुत करते। किसी ने ऐसा नहीं किया। यह बताता है कि कानून का दबाव न हो तो राजनीतिक इच्छाशक्ति कमजोर पड़ जाती है।
दलों के पास जो तर्क हैं, वे आंकड़ों से मेल नहीं खाते। पहला तर्क यह दिया जाता है कि योग्य महिला उम्मीदवार नहीं मिलतीं। जबकि पंचायत से लेकर संसद तक का अनुभव इसका उलटा कहता है। देश में लाखों महिला पंचायत प्रतिनिधि गांवों की सड़कों, पानी, स्कूल और स्वास्थ्य जैसी व्यवस्थाओं पर काम कर रही हैं। डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, प्रोफेसर और सामाजिक कार्यकर्ता बड़ी संख्या में मौजूद हैं, पर उनकी फाइलें दलों की स्क्रीनिंग कमेटियों तक नहीं पहुंचतीं। दूसरा तर्क जीत की संभावना का दिया जाता है। महिलाओं को अक्सर कमजोर या हारने वाली सीटें दी जाती हैं ताकि आंकड़ों में उनका नाम शामिल हो जाए, पर जीत की संभावना कम रहे। जबकि चुनावी विश्लेषण बताते हैं कि जहां महिलाओं को मजबूत समर्थन और उपयुक्त सीटें मिलीं, वहां उनका प्रदर्शन पुरुष उम्मीदवारों के बराबर या कई बार बेहतर रहा।
तथ्यात्मक तुलना करें तो भारत दुनिया में महिला प्रतिनिधित्व के मामले में काफी पीछे है। रवांडा में संसद में महिलाओं की भागीदारी 61 प्रतिशत से अधिक है। मेक्सिको लगभग 50 प्रतिशत के करीब है। स्वीडन, नॉर्वे और फिनलैंड में यह 45 से 47 प्रतिशत के बीच है। दक्षिण एशिया में भी कई देशों का प्रदर्शन बेहतर है। भारत 13.6 प्रतिशत के साथ विश्व औसत से काफी नीचे है। यह स्थिति उस देश के लिए चिंताजनक है जो नारी शक्ति की बात करता है और विश्वगुरु बनने का सपना देखता है।
समाधान भी स्पष्ट हैं। राजनीतिक दलों को अपने संविधान में दर्ज 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व को तुरंत लागू करना चाहिए। टिकट वितरण समितियों में महिलाओं की अनिवार्य भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। महिला उम्मीदवारों के लिए आर्थिक सहायता और चुनावी संसाधनों की व्यवस्था होनी चाहिए। चुनाव आयोग को प्रत्येक दल से महिला उम्मीदवारों और निर्वाचित प्रतिनिधियों का विस्तृत डेटा सार्वजनिक कराने की व्यवस्था करनी चाहिए। आखिरकार, लोकतंत्र केवल वोट देने का अधिकार नहीं, बल्कि निर्णय लेने में समान भागीदारी का भी नाम है। आधी आबादी को दस प्रतिशत की छत देकर राजनीति ने लोकतंत्र की ऊंचाई सीमित कर दी है। अब समय आ गया है कि यह छत ऊंची की जाए और प्रतिनिधित्व के दरवाजे सचमुच खोले जाएं।














