भोपाल, 25 जून।
सरकार ने तीन साल पहले कर्मचारी राज्य बीमा (ईएसआई) अस्पताल को सुपर स्पेशलिटी का दर्जा देकर बड़ी घोषणा की थी। कागज पर शब्द बड़े थे। सुपर स्पेशलिटी का मतलब था कि अब बीमित श्रमिकों और उनके परिवारों को दिल, गुर्दा, न्यूरो और कैंसर जैसी जटिल बीमारियों का इलाज एक ही छत के नीचे मिलेगा। उन्हें एम्स, हमीदिया या निजी अस्पतालों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। चार लाख बीमित श्रमिकों ने राहत की सांस ली थी, पर हकीकत आज भी वही है। जिस अस्पताल को सुपर स्पेशलिटी का तमगा मिला, उसे देखकर लगता है कि तमगा पुरानी दीवार पर टांग दिया गया है और अंदर आज भी वही जर्जर मशीनें, वही डॉक्टरों की कमी और वही मरीजों की लंबी कतारें हैं।
सबसे बड़ा संकट विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी का है। सुपर स्पेशलिटी अस्पताल का मतलब है कार्डियोलॉजिस्ट, न्यूरोसर्जन, नेफ्रोलॉजिस्ट और ऑन्कोलॉजिस्ट जैसी विशेष शाखाओं के डॉक्टर। पर यहां कई पद खाली हैं। जो डॉक्टर हैं, उनमें से अधिकांश प्रतिनियुक्ति पर आए हैं और स्थायी रूप से काम करने को तैयार नहीं हैं। नतीजा यह है कि ओपीडी में मरीज घंटों बैठा रहता है और जब नंबर आता है तो डॉक्टर उपलब्ध नहीं मिलता। रेफर की पर्ची हाथ में थमा दी जाती है - एम्स जाओ, हमीदिया जाओ। एक श्रमिक, जो फैक्ट्री में आठ घंटे मशीन चलाकर थक चुका है, वह बीमारी के साथ अस्पतालों के चक्कर लगाने को मजबूर है। ईएसआई का पैसा हर महीने वेतन से कटता है, पर सुविधा के नाम पर केवल निराशा मिलती है।
दूसरी बड़ी विफलता जांच सुविधाओं की है। सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में एक्स-रे, सीटी स्कैन, सोनोग्राफी और आधुनिक पैथोलॉजी लैब जैसी सुविधाएं होना आवश्यक है, पर यहां आज भी कई व्यवस्थाएं अधूरी हैं। पुरानी मशीनों के भरोसे काम चल रहा है। सोनोग्राफी मशीन पर्याप्त नहीं है और कई जरूरी पैथोलॉजी जांचें अस्पताल में उपलब्ध नहीं हैं। ब्लड शुगर, हीमोग्लोबिन जैसी सामान्य जांचों के लिए भी मरीजों को बाहर भेजा जाता है। बाहर का मतलब निजी लैब, जहां एक बार में हजारों रुपये खर्च हो जाते हैं। बीमित श्रमिक की आय सीमित होती है। वह हर महीने ईएसआई का अंशदान देता है और फिर इलाज के लिए अलग से पैसा खर्च करता है। यह दोहरा बोझ किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।
तीन साल बीत जाने के बाद भी हालात नहीं बदले हैं। इसका एक कारण प्रशासनिक बदलाव भी है। अस्पताल पहले राज्य शासन के अधीन था, बाद में उसका संचालन कर्मचारी राज्य बीमा निगम को सौंप दिया गया। टेकओवर के बाद निगम और राज्य सरकार के बीच समन्वय का अभाव दिखाई दिया। फाइलें इधर-उधर घूमती रहीं, भर्तियां रुकी रहीं और डॉक्टरों की नियुक्तियां लंबित पड़ी रहीं। इसी खींचतान में सबसे अधिक नुकसान मरीजों को हुआ। श्रमिक संगठनों ने कई बार शिकायतें कीं, धरने दिए और अस्पताल का घेराव भी किया। उनका कहना है कि जब तक आधुनिक मशीनें नहीं लगेंगी और विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं आएंगे, तक तक सुपर स्पेशलिटी का दर्जा केवल नाम भर रहेगा। यह बात पूरी तरह सही है। तमगा लगाने से इलाज नहीं होता, उसके लिए संसाधन और इच्छाशक्ति दोनों चाहिए।
सुपर स्पेशलिटी का वादा केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि चार लाख श्रमिकों के भरोसे का सवाल था। कारखानों में काम करने वाला मजदूर जानता है कि उसकी नौकरी जोखिम भरी है। मशीन से चोट लग सकती है, रसायनों से नुकसान हो सकता है और धूल-धुएं से गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। इसी भरोसे पर वह ईएसआई में योगदान देता है कि जरूरत पड़ने पर अस्पताल उसका साथ देगा। लेकिन जब संकट का समय आता है तो उसे रेफर कर दिया जाता है। मरीज को स्ट्रेचर पर लिटाकर दूसरे अस्पताल भेजने की मजबूरी किसी भी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरी को उजागर करती है।
समस्या केवल डॉक्टरों और मशीनों तक सीमित नहीं है। उपचार सेवाएं भी सीमित हैं। सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में हृदय रोग, डायलिसिस, न्यूरो सर्जरी और कैंसर उपचार जैसी सुविधाएं प्रभावी रूप से उपलब्ध होनी चाहिए, पर यहां बेड कम हैं, ऑपरेशन थियेटर पुराने हैं और आईसीयू में संसाधनों की कमी है। नर्सिंग स्टाफ पर अत्यधिक दबाव है। ऐसे में गुणवत्तापूर्ण इलाज की अपेक्षा करना कठिन हो जाता है। इसका सबसे ज्यादा असर महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ता है। गर्भवती महिला अल्ट्रासाउंड के लिए भटकती है, बच्चे को विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं मिलता और बुजुर्ग मरीज को लंबा इंतजार करना पड़ता है।
अब जरूरत युद्ध स्तर पर सुधार की है। खाली पड़े डॉक्टरों के पद तुरंत भरे जाएं। निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को संविदा पर जोड़ा जाए। मशीनों का आधुनिकीकरण हो और डिजिटल जांच सुविधाएं विकसित की जाएं। हर तिमाही यह समीक्षा हो कि कितनी मशीनें लगीं, कितने डॉक्टर नियुक्त हुए और कितने मरीजों को लाभ मिला। अस्पताल प्रबंधन में श्रमिक प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाना चाहिए, ताकि जमीनी फीडबैक सीधे निर्णय लेने वालों तक पहुंचे।
सुपर स्पेशलिटी का दर्जा देना आसान है, पर उसे सार्थक बनाना कठिन है। यह केवल फाइल का शब्द नहीं, बल्कि मरीज की उम्मीद है। सरकार और ईएसआई निगम को अस्पताल के वार्डों में जाकर वास्तविक स्थिति देखनी चाहिए। चार लाख बीमित श्रमिक प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। उनके स्वास्थ्य की उपेक्षा प्रदेश के विकास की उपेक्षा है। अस्पताल को वास्तव में सुपर स्पेशलिटी बनाना है तो पहले इरादों को सुपर स्पेशल बनाना होगा। तभी मशीनें आएंगी, डॉक्टर टिकेंगे और मरीज के चेहरे पर भरोसा लौटेगा। अन्यथा तमगा दीवार पर टंगा रहेगा और इलाज अब भी पुरानी व्यवस्था के भरोसे चलता रहेगा।














