संपादकीय
25 Jun, 2026

ढलान पर माओवाद, अब विकास की राह चुनेगा

नारायणपुर में माओवादियों के आत्मसमर्पण और बस्तर में बढ़ते विकास कार्य इस बात का संकेत हैं कि क्षेत्र में हिंसा की जगह अब विश्वास और विकास की राह मजबूत हो रही है।

नारायणपुर, 25 जून।

छत्तीसगढ़ के बस्तर, दंतेवाड़ा, सुकमा और नारायणपुर जैसे जिलों का नाम सुनते ही बरसों से बंदूक, बारूद और हिंसा की तस्वीर उभरती थी। पर अब यह तस्वीर बदल रही है। एक समय था जब इन इलाकों में सुरक्षा बलों की गाड़ियां भी दिन में निकलने से कतराती थीं और विकास कार्यों की कल्पना भी कठिन थी। आज वही बस्तर, जिसे माओवादियों का गढ़ माना जाता था, वहां सड़कें बन रही हैं, स्कूल खुल रहे हैं, मोबाइल टावर लग रहे हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि आदिवासी युवा अब बंदूक नहीं, कलम थाम रहा है। यह बदलाव अचानक नहीं आया है। यह वर्षों की रणनीति, सुरक्षा बलों के धैर्य और सरकार की विकासोन्मुख नीतियों का परिणाम है।

माओवाद ने मध्य भारत के बड़े हिस्से को लंबे समय तक हिंसा की आग में झोंक दिया था। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के जंगल माओवादियों की शरणस्थली बने रहे। नारायणपुर में 210 माओवादियों के आत्मसमर्पण और हथियार डालने की घटना केवल एक खबर नहीं, बल्कि एक युग के अंत का संकेत है। जब इतने प्रशिक्षित कैडर एक साथ हथियार छोड़ देते हैं तो इसका अर्थ है कि हिंसा का रास्ता अब आकर्षक नहीं रहा। माओवादी भी समझ गए हैं कि बंदूक से समाज नहीं बदला जा सकता। बदलाव की असली ताकत वोट, शिक्षा, सड़क और रोजगार से आती है।

सुरक्षा बलों ने पिछले कुछ वर्षों में जो अभियान चलाए, उन्होंने माओवाद की रीढ़ तोड़ दी। बड़े कैडरों को निष्क्रिय किया गया और उनके नेटवर्क को ध्वस्त किया गया। लेकिन केवल बंदूक के बल पर माओवाद समाप्त नहीं किया जा सकता था। इसलिए सरकार ने दोहरी रणनीति अपनाई - एक हाथ में सुरक्षा और दूसरे हाथ में विकास। बस्तर में बन रही सड़कें केवल डामर और कंक्रीट की नहीं, बल्कि विश्वास की सड़कें हैं। जो स्कूल खुल रहे हैं, वे केवल भवन नहीं, बल्कि भविष्य की नींव हैं। मोबाइल कनेक्टिविटी पहुंचने से आदिवासी किसान अपनी उपज का उचित मूल्य जान पा रहा है और महिला स्व-सहायता समूह आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं।

माओवाद वहीं पनपता है जहां राज्य की उपस्थिति कमजोर होती है। जहां स्कूल नहीं होते, वहां नक्सली अपना प्रभाव स्थापित करते हैं। जहां अस्पताल नहीं होते, वहां वे विकल्प बनने की कोशिश करते हैं। जहां रोजगार नहीं होता, वहां युवाओं को बंदूक थमा दी जाती है। लेकिन जब शासन व्यवस्था गांव तक पहुंचती है तो माओवाद की जमीन अपने आप सिकुड़ने लगती है। नारायणपुर इसका उदाहरण है। आज यहां प्रधानमंत्री आवास योजना के घर बन रहे हैं, आयुष्मान योजना के तहत इलाज हो रहा है और वनाधिकार पट्टों से आदिवासी अपनी जमीन का मालिक बन रहा है।

अब सबसे बड़ी चुनौती इस सफलता को स्थायी बनाना है। बस्तर में जो सड़कें बनी हैं, उनका रखरखाव हो। स्कूलों में योग्य शिक्षक पहुंचें। इंटरनेट और संचार सुविधाएं बेहतर हों। आदिवासी उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार मिले। साथ ही विकास के नाम पर आदिवासियों के अधिकारों की अनदेखी न हो। बस्तर का परिवर्तन भारत के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है कि समस्याओं का समाधान केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि विकास और विश्वास के रास्ते से भी निकलता है। माओवाद इसलिए ढलान पर है क्योंकि अब आदिवासी समाज ने तय कर लिया है कि उसके बच्चों का भविष्य बंदूक नहीं, बल्कि शिक्षा और अवसर लिखेंगे। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत है, जहां संविधान ने हिंसा पर विजय प्राप्त की है।

|
आज का राशिफल

व्यर्थ की भाग-दौड़ से बचा जाए तो अच्छा है। दुर्लभ स्वप्न साकार होंगे। मेल-मिलाप से काम बनाने की कोशिश लाभ देगी। अपने काम में सुविधा मिल जाने से प्रगति होगी। कोई प्रिय वस्तु अथवा नवीन वस्त्राभूषण प्राप्त होंगे। पूर्व नियोजित कार्यक्रम सरलता से संपन्न हो जाएंग। शुभांक-2-4-6

आज का मौसम

भोपाल

26° / 32°

Scattered thunderstorms

ट्रेंडिंग न्यूज़