वाशिंगटन, 26 जून।
अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के वीजा नियमों में प्रस्तावित बदलाव सुरक्षा और प्रशासनिक नियंत्रण के उद्देश्य से प्रेरित प्रतीत होता है। वर्तमान 'ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस' व्यवस्था में छात्र तब तक वैध माने जाते हैं, जब तक वे शैक्षणिक कार्यक्रम में नामांकित रहते हैं और वीजा की शर्तों का पालन करते हैं। इसकी कोई निश्चित समाप्ति तिथि नहीं होती। प्रस्ताव के अनुसार अब एफ-1 छात्र वीजा, जे-1 एक्सचेंज वीजा और अन्य श्रेणियों के लिए अधिकतम चार वर्ष की समय-सीमा तय होगी। इसके बाद पढ़ाई जारी रखने के लिए औपचारिक मंजूरी लेनी होगी।
तथ्यों के आधार पर यह बदलाव उन छात्रों को सीधे प्रभावित करेगा, जिनके पाठ्यक्रम चार वर्ष से अधिक अवधि के हैं। वर्ष 2023-24 में अमेरिका के उच्च शिक्षण संस्थानों में 3.31 लाख से अधिक भारतीय छात्र अध्ययनरत थे। इनमें बड़ी संख्या पीएचडी, मेडिकल, इंजीनियरिंग और शोध आधारित कार्यक्रमों की है, जहां डिग्री पूरी करने में पांच से सात वर्ष लगना सामान्य बात है। प्रस्ताव लागू होने पर ऐसे छात्रों को चार वर्ष पूरे होने के बाद वीजा विस्तार के लिए आवेदन करना होगा और अतिरिक्त दस्तावेज, प्रशासनिक जांच तथा मंजूरी की प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा।
इस प्रस्ताव के दो पक्ष हैं। पहला, सुरक्षा और निगरानी का, जिसके अनुसार निश्चित समय-सीमा से वीजाधारकों की निगरानी आसान होगी और वीजा के दुरुपयोग की संभावना घटेगी। दूसरा पक्ष शैक्षणिक निरंतरता का है। शोध आधारित कार्यक्रमों में यह व्यवस्था कृत्रिम बाधा बन सकती है। प्रशासनिक देरी या दस्तावेज संबंधी त्रुटियों से छात्रों पर अनिश्चितता और कानूनी जोखिम बढ़ सकता है।
सुरक्षा की आवश्यकता उचित है, लेकिन शोध और उच्च शिक्षा की प्रकृति को देखते हुए पीएचडी, मेडिकल तथा अन्य दीर्घकालिक पाठ्यक्रमों के लिए अपवाद या स्वचालित विस्तार की व्यवस्था आवश्यक है। अन्यथा भारत जैसे देशों के प्रतिभाशाली छात्र दूसरे विकल्प तलाश सकते हैं, जिससे अमेरिका की उच्च शिक्षा और अनुसंधान व्यवस्था को दीर्घकालिक नुकसान हो सकता है।








