मध्यप्रदेश, 26 जून।
जब इलाज की जगह बीमारी बेची जाने लगे, जब दवा की दुकान नशे का अड्डा बन जाए, तब समझ जाना चाहिए कि समाज की रीढ़ में दीमक लग चुकी है। मध्यप्रदेश में नशे के खिलाफ पुलिस और नारकोटिक्स विभाग की लगातार कार्रवाई चल रही है। हर महीने बड़े पैमाने पर एमडी ड्रग्स बरामद हो रही है, करोड़ों रुपये की खेप पकड़ी जा रही है और तस्कर गिरफ्तार हो रहे हैं। इसके बावजूद नशे का कारोबार रुकने का नाम नहीं ले रहा। इसका कारण स्पष्ट है। अब नशे के सौदागर नए ठिकाने तलाश चुके हैं और सबसे खतरनाक ठिकाना बन चुके हैं अस्पताल और दवा की दुकानें, जहां मरीज को बचाने वाली दवा ही युवा पीढ़ी को बर्बाद करने का हथियार बनती जा रही है।
पिछले दिनों हुई कई छापेमार कार्रवाइयों में यह बात सामने आई कि नशीली दवाइयों की तस्करी अब खुले बाजार से हटकर अस्पतालों और फार्मेसियों के भीतर पहुंच गई है। डॉक्टर की पर्ची के नाम पर नींद की गोलियां, दर्द निवारक कैप्सूल और नशे के लिए इस्तेमाल होने वाले सिरप धड़ल्ले से बेचे जा रहे हैं। मरीज के नाम पर फर्जी पर्चियां बनाई जाती हैं और देखते ही देखते अस्पताल की दवा की दुकान नशे के अड्डे में बदल जाती है। जब इलाज करने वाली जगह से ही नशा मिलने लगे, तो सड़क पर की गई पुलिस कार्रवाई का क्या लाभ? तस्करों को पता है कि कानून का डर उन्हें सड़क पर है, लेकिन अस्पताल के भीतर वे सफेद कोट की आड़ में सुरक्षित हैं।
इस खेल के पीछे बड़े नशे के सौदागर हैं, जो पुलिस की हर कार्रवाई के बाद अपना रास्ता बदल लेते हैं। पहले नशा सीमा पार से आता था, फिर छोटे तस्करों के जरिए शहरों तक पहुंचता था। अब नेटवर्क सीधे अस्पतालों और दवा विक्रेताओं तक पहुंच गया है, क्योंकि यहां मुनाफा सबसे अधिक और पकड़े जाने का खतरा सबसे कम है। एक तरफ पुलिस की सख्ती से सड़क पर तस्करी महंगी हो गई है, तो दूसरी तरफ अस्पतालों की आड़ में तस्करी आसान हो गई है। यही कारण है कि नारकोटिक्स विभाग की लगातार छापेमारी के बावजूद एमडी जैसे ड्रग्स की सप्लाई बनी हुई है, क्योंकि सप्लाई लाइन का एक सिरा अब उस जगह पहुंच चुका है, जहां सामान्यतः किसी को संदेह नहीं होता।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस धंधे में लिप्त कुछ डॉक्टर, फार्मासिस्ट और अस्पताल संचालक भी शामिल पाए जा रहे हैं, जो लालच में आकर मानवता को बेच रहे हैं। मरीज की मजबूरी का फायदा उठाकर फर्जी पर्चियां बनाई जाती हैं, बिना उचित जांच के नशीली दवाएं दे दी जाती हैं और बदले में मोटा कमीशन लिया जाता है। जब समाज का वह वर्ग, जो जीवन बचाने की शपथ लेता है, वही नशे का कारोबार करने लगे, तो पुलिस अकेले क्या कर सकती है? बंदूक से गोली चलाई जा सकती है, लेकिन सफेद कोट के भीतर छिपे अपराध को पकड़ना कहीं अधिक कठिन होता है। इसलिए नशे के कारोबार पर अंकुश लगाने के लिए केवल पुलिस की कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। अस्पताल प्रशासन और दवा नियामक तंत्र को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव युवाओं पर पड़ रहा है। स्कूल और कॉलेजों के बाहर खड़े तस्कर अब अस्पतालों के चक्कर लगाने लगे हैं। उन्हें पता है कि यदि कोई युवा सीधे नशा मांगेगा तो पकड़ा जाएगा, लेकिन यदि वह पेट दर्द या अनिद्रा की शिकायत लेकर डॉक्टर के पास जाए और मिलीभगत से नशीली दवा हासिल कर ले, तो उसे रोकने वाला कोई नहीं होगा। इस तरह नशे की लत लगना आसान हो गया है। एक बार लत लगने के बाद युवा अपना भविष्य, परिवार और समाज सब कुछ दांव पर लगा देता है। नशे का कारोबार इसी कमजोरी पर फलता-फूलता है, क्योंकि एक नशेड़ी के पीछे दस नए ग्राहक तैयार हो जाते हैं।
इस समस्या का समाधान केवल छापेमारी से नहीं होगा, बल्कि पूरी व्यवस्था को सुधारना होगा। सबसे पहले डॉक्टरों और फार्मासिस्टों की पर्ची प्रणाली को डिजिटल और पारदर्शी बनाया जाए। हर नशीली दवा की बिक्री का रिकॉर्ड ऑनलाइन होना चाहिए, ताकि एक ही व्यक्ति अलग-अलग दुकानों से बार-बार दवा न खरीद सके। अस्पतालों में दवा बिक्री पर कड़ी निगरानी रखी जाए, नियमित औचक निरीक्षण हों और फर्जी पर्चियां बनाने वाले डॉक्टरों का लाइसेंस तत्काल निरस्त किया जाए। साथ ही समाज को भी जागरूक करना होगा। माता-पिता, शिक्षक और विद्यार्थियों को यह समझाना होगा कि नशा आनंद नहीं, बल्कि धीरे-धीरे मौत की ओर ले जाने वाला रास्ता है। स्कूलों और कॉलेजों में नशा विरोधी अभियान चलाए जाएं तथा पुनर्वास केंद्रों को और अधिक प्रभावी बनाया जाए।
पुलिस और नारकोटिक्स विभाग का कार्य सराहनीय है। उन्होंने कई बड़े नेटवर्क ध्वस्त किए हैं और करोड़ों रुपये की ड्रग्स जब्त की है। लेकिन जब तक अस्पताल और दवा की दुकानें नशे के कारोबार का माध्यम बनी रहेंगी, तब तक तस्कर हर बार नया रास्ता खोज लेंगे। अब लड़ाई केवल सड़क पर नहीं, बल्कि ऑपरेशन थिएटर से लेकर मेडिकल स्टोर तक लड़नी होगी। जहां दवा जीवन बचाने के लिए होती है, वहां मौत का सौदा नहीं होना चाहिए।
नशे का कारोबार तभी रुकेगा, जब उसकी मांग खत्म होगी और मांग तभी घटेगी, जब युवाओं को नशे से बेहतर विकल्प मिलेंगे। खेल, शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार के अवसर युवाओं को नशे से दूर रख सकते हैं। साथ ही अस्पतालों की आड़ में धंधा चलाने वाले बड़े सौदागरों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। सफेद कोट पहनकर अपराध करने वाले डॉक्टरों और फार्मासिस्टों को सबसे कड़ी सजा मिलनी चाहिए, क्योंकि गद्दार हमेशा दुश्मन से अधिक खतरनाक होता है। समाज को यह तय करना होगा कि अस्पताल मंदिर हैं या मंडी। मंदिर में जीवन बचाया जाता है, मंडी में सौदा होता है। यदि अस्पताल मंडी बन गए, तो आने वाली पीढ़ियां बर्बाद हो जाएंगी। इसलिए समय की मांग है कि पुलिस, प्रशासन, समाज और स्वास्थ्य तंत्र मिलकर इस गंदगी को साफ करें, वरना वह दिन दूर नहीं जब हर गली में अस्पताल होगा और हर अस्पताल नशे की दुकान बन जाएगा।









