नई दिल्ली, 26 जून।
किशोरियों में गर्भधारण दर 37 से बढ़कर 47 प्रतिशत होना केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि समाज के लिए गंभीर चेतावनी है। शिक्षा का अभाव और जर्जर हो चुकी परम्पराएं देश के भविष्य को अंधकार की ओर धकेल रही हैं। देश के भविष्य की नींव कही जाने वाली किशोरियों की कोख जब समय से पहले मातृत्व का बोझ उठाने लगे, तो समझ जाना चाहिए कि समाज की शिक्षा व्यवस्था और सांस्कृतिक सोच दोनों में गहरी दरार आ चुकी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के ताजा आंकड़े यही बताते हैं कि 15 से 19 वर्ष आयु वर्ग की किशोरियों में गर्भधारण की दर 37 प्रतिशत से बढ़कर 47 प्रतिशत हो गई है। यह केवल आंकड़ा नहीं है, बल्कि हजारों बेटियों का स्कूल छूटना, हजारों सपनों का दम तोड़ना और देश की जनशक्ति का समय से पहले जिम्मेदारियों के बोझ तले दब जाना है। जब एक किशोरी कलम पकड़ने की उम्र में पालना संभालने लगे, तो विकास की गति अपने आप धीमी पड़ जाती है।
इस बढ़ोतरी के पीछे सबसे बड़ा कारण शिक्षा का अभाव है। गांव, देहात और आदिवासी क्षेत्रों में आज भी बड़ी संख्या में लड़कियां आठवीं या दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़ देती हैं। इसके पीछे गरीबी, सामाजिक दबाव, घरेलू जिम्मेदारियां और सबसे बड़ा कारण बाल विवाह की परम्परा है। जब 15-16 वर्ष की उम्र में विवाह हो जाएगा, तो गर्भधारण भी स्वाभाविक रूप से जल्दी होगा। यह सोच आज भी अनेक परिवारों में मौजूद है। शिक्षा के अभाव में किशोरियों को अपने शरीर, प्रजनन स्वास्थ्य और पोषण संबंधी आवश्यक जानकारी नहीं मिल पाती। उन्हें यह भी नहीं बताया जाता कि कम उम्र में गर्भधारण से मां और बच्चे, दोनों के जीवन पर गंभीर खतरा मंडरा सकता है। रक्ताल्पता, प्रसव के समय जटिलताएं, नवजात शिशु का कम वजन और मृत्यु दर जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं, लेकिन अज्ञानता के कारण इन खतरों को अनदेखा कर दिया जाता है।
जर्जर हो चुकी सामाजिक परम्पराएं और मान्यताएं भी इस समस्या की बड़ी वजह हैं। आज भी बेटी को पराया धन मानकर उसकी शादी जल्दी करने की होड़ लगी रहती है। बिरादरी, पंचायत और रिश्तेदारों का दबाव माता-पिता को मजबूर कर देता है कि बेटी को 18 वर्ष से पहले ही विदा कर दें। लोग यह भूल जाते हैं कि 18 वर्ष से कम उम्र में विवाह कानूनन बाल विवाह है और दंडनीय अपराध भी। लेकिन कानून की किताब अक्सर घर की चौखट पार नहीं कर पाती। जब समाज स्वयं यह तय कर ले कि बेटी का भविष्य ससुराल है, स्कूल नहीं, तब शिक्षा की कोई भी योजना पूरी तरह सफल नहीं हो सकती। बाल विवाह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि ऐसी जंजीर है जो किशोरी के पैरों में बंधकर उसे जीवनभर पीछे खींचती रहती है।
यौन शिक्षा और प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी जानकारी का अभाव भी गंभीर समस्या है। आज भी स्कूलों और कॉलेजों में किशोरियों को खुलकर यह नहीं बताया जाता कि माहवारी क्या है, गर्भ कैसे ठहरता है, गर्भनिरोधक साधन क्या हैं और असुरक्षित संबंधों से क्या खतरे हो सकते हैं। शर्म, संकोच और परम्परा के नाम पर इस विषय पर चुप्पी साध ली जाती है। परिणाम यह होता है कि किशोरियां अधूरी या गलत जानकारी के भरोसे रहती हैं, अफवाहों पर विश्वास करती हैं और अनचाहे गर्भधारण का शिकार बन जाती हैं। जब सही जानकारी नहीं होगी, तो सही निर्णय कैसे होगा, और जब निर्णय ही गलत होगा, तो जीवन सही दिशा कैसे पाएगा।
इस समस्या को केवल स्वास्थ्य विभाग का विषय मानकर छोड़ना उचित नहीं होगा। यह पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। सबसे पहले व्यापक जनजागरण अभियान चलाने की आवश्यकता है। गांव-गांव, मोहल्लों, नुक्कड़ नाटकों, रैलियों और पंचायत बैठकों के माध्यम से लोगों को समझाना होगा कि बेटी पढ़ेगी तो देश आगे बढ़ेगा, लेकिन यदि वह 18 वर्ष से पहले मां बनेगी तो देश का भविष्य भी प्रभावित होगा। माता-पिता को यह समझाना होगा कि बेटी की शादी उसकी उम्र के अनुसार होनी चाहिए, न कि दहेज या बिरादरी के दबाव के कारण। आशा कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और शिक्षक इस अभियान के सबसे प्रभावी सिपाही बन सकते हैं, क्योंकि लोगों का विश्वास उन्हीं पर सबसे अधिक होता है।
साथ ही शिक्षा व्यवस्था में भी व्यापक सुधार आवश्यक है। आठवीं कक्षा से ही बालिकाओं को जीवन कौशल शिक्षा दी जानी चाहिए, जिसमें प्रजनन स्वास्थ्य, पोषण, मानसिक स्वास्थ्य और लैंगिक समानता जैसे विषय शामिल हों। वैज्ञानिक और सहज भाषा में जानकारी दी जाए, ताकि किशोरियां अपने शरीर को समझ सकें और सही निर्णय ले सकें। स्कूलों में नियमित स्वास्थ्य जांच हो तथा यदि कोई किशोरी गर्भवती पाई जाए तो उसे कलंकित करने के बजाय उसकी पढ़ाई जारी रखने में सहायता दी जाए। ड्रॉपआउट रोकने के लिए छात्रवृत्ति, साइकिल और निःशुल्क सैनिटरी पैड जैसी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन भी आवश्यक है।
संस्कृति और परम्परा के नाम पर जो रूढ़ियां बेटियों को आगे बढ़ने से रोक रही हैं, उन्हें बदलने का समय आ गया है। परम्परा का सम्मान आवश्यक है, लेकिन जो परम्परा बेटी के जीवन और भविष्य पर भारी पड़े, उसे बदलना ही वास्तविक प्रगति है। बेटी को लक्ष्मी या देवी मानने का अर्थ केवल प्रतीकात्मक सम्मान नहीं, बल्कि उसके अधिकारों, शिक्षा और सपनों का सम्मान भी होना चाहिए। यदि हमारी परम्पराएं बेटियों को कम उम्र में मातृत्व के लिए मजबूर कर रही हैं, तो वे परम्पराएं नहीं, बल्कि बेड़ियां हैं, जिन्हें समय रहते तोड़ना आवश्यक है।
सरकार, प्रशासन, पुलिस और समाज सभी को मिलकर इस दिशा में कार्य करना होगा। बाल विवाह की सूचना देने वालों को प्रोत्साहन मिले और इसे कराने वालों पर कड़ी कार्रवाई हो। पंचायत प्रतिनिधि संकल्प लें कि उनके क्षेत्र में कोई बाल विवाह नहीं होगा। मीडिया और सोशल मीडिया इस अभियान को जन-जन तक पहुंचाएं। प्रसिद्ध खिलाड़ी और सेलिब्रिटी भी आगे आएं, क्योंकि युवा उनकी बात सुनते हैं। किशोरियों में बढ़ती गर्भधारण दर केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं, बल्कि शिक्षा, लैंगिक समानता और देश के विकास का भी प्रश्न है। यदि आज समाज नहीं जागा, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती है। इसलिए आवश्यक है कि जनजागरण का बिगुल बजे, शिक्षा की मशाल जले और रूढ़ियों की जंजीर टूटे। बेटी बचेगी, पढ़ेगी और उचित समय पर मां बनेगी, तभी देश का भविष्य वास्तव में उज्ज्वल होगा।









