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न्यायपालिका
06 Aug, 2026

हाईकोर्ट ने तरुण तेजपाल को दुष्कर्म मामले में दोषी ठहराया

बॉम्बे हाईकोर्ट ने वर्ष 2013 के यौन उत्पीड़न मामले में ट्रायल कोर्ट का बरी करने वाला फैसला रद्द कर तरुण तेजपाल को विभिन्न धाराओं में दोषी ठहराया।

मुंबई, 6 अगस्त।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने वर्ष 2013 के चर्चित यौन उत्पीड़न मामले में पूर्व संपादक तरुण तेजपाल को ट्रायल कोर्ट से मिली बरी किए जाने की राहत रद्द करते हुए उन्हें दुष्कर्म समेत विभिन्न धाराओं में दोषी ठहराया है। राज्य सरकार की ओर से वर्ष 2022 में दायर अपील पर यह फैसला सुनाया गया।

न्यायमूर्ति नीला गोखले और न्यायमूर्ति अमित जमसांडेकर की खंडपीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला निरस्त किया जाता है और आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(एफ) एवं (के), 354ए और 354बी के तहत दोषी ठहराया जाता है।

धारा 376(2)(एफ) ऐसे व्यक्ति द्वारा दुष्कर्म को दंडनीय बनाती है, जो महिला के प्रति विश्वास या अधिकार की स्थिति में हो। धारा 354ए यौन उत्पीड़न से जुड़े अपराधों पर लागू होती है, जिसमें अवांछित शारीरिक संपर्क, यौन प्रस्ताव या यौन संबंधों की मांग शामिल है। वहीं धारा 354बी महिला को निर्वस्त्र करने के उद्देश्य से हमला या आपराधिक बल प्रयोग से संबंधित है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि सजा के निर्धारण पर मामले की सुनवाई दिन में बाद में की जाएगी।

यह मामला वर्ष 2013 का है, जब गोवा के एक होटल की लिफ्ट में एक जूनियर महिला सहकर्मी के साथ यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया गया था। इसके बाद गोवा पुलिस ने दुष्कर्म सहित विभिन्न धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की थी।

आरोपी को नवंबर 2013 में गिरफ्तार किया गया था और जुलाई 2014 में जमानत मिली थी। वर्ष 2017 में मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई और मई 2021 में अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने उन्हें बरी कर दिया था।

ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि जांच अधिकारी से कई चूक हुईं और अभियोजन पक्ष महत्वपूर्ण साक्ष्य, जिनमें सीसीटीवी फुटेज भी शामिल थे, प्रस्तुत करने में असफल रहा। इसके बाद राज्य सरकार ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि ट्रायल कोर्ट ने आरोपी के आचरण की बजाय शिकायतकर्ता के चरित्र और घटना के बाद के व्यवहार पर अधिक ध्यान दिया। यह भी कहा गया कि पीड़िता की जीवनशैली, व्हाट्सएप बातचीत और कथित सामान्य व्यवहार जैसी अप्रासंगिक बातों के आधार पर सहमति का निष्कर्ष निकालना गलत था।

राज्य पक्ष ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता के बयान को चुनिंदा तरीके से पढ़ा, जबकि माफी वाले ईमेल जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज बचाव पक्ष के उस दावे को कमजोर करते हैं कि कोई घटना हुई ही नहीं थी।

बचाव पक्ष ने हाईकोर्ट में कहा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला सही था और शिकायतकर्ता के बयान का लिफ्ट की तकनीकी व्यवस्था तथा सीसीटीवी फुटेज जैसे वस्तुनिष्ठ साक्ष्यों से मेल नहीं बैठता।

बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि घटना के बाद शिकायतकर्ता का व्यवहार, संदेशों में बातचीत और अन्य लोगों से संवाद किसी आघात की स्थिति नहीं दर्शाते। साथ ही साक्ष्य छिपाने या बयान तैयार कराए जाने की आशंका भी जताई गई।

बचाव पक्ष ने घटना से पूरी तरह इनकार करते हुए कहा कि किसी भी प्रकार का यौन कृत्य सिद्ध नहीं हुआ और मामला मीडिया तथा संस्थागत दबाव के कारण आगे बढ़ा।

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