काठमांडू, 22 अक्टूबर।
नेपाल की राजधानी काठमांडू के पाटन दरबार संग्रहालय के ऐतिहासिक मूलचोक में ठेचो के पारंपरिक नवदुर्गा नृत्य की प्रस्तुति के साथ इस वर्ष के दुर्गापूजा पर्व का औपचारिक समापन हो गया।
परंपरा के अनुसार विजयादशमी और कोजाग्रत पूर्णिमा पर मंगलबाजार में दो बार नवदुर्गा नृत्य का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर बुधवार को ठेचो के देवगण मुख्य देवता, मुखौटे, पारंपरिक वस्त्र, आभूषण और अन्य पूजन सामग्री लेकर खर्पन के माध्यम से मंगलबाजार पहुंचे।
नेवार समुदाय का नवदुर्गा नृत्य प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। देवी की आराधना, धार्मिक अनुष्ठानों और पारंपरिक नृत्य के मेल ने पाटन दरबार क्षेत्र को भक्तिमय वातावरण से भर दिया।
ठेचो के नवदुर्गा गुठी के सदस्य विकास माली के अनुसार, यह आयोजन हर साल देवी की शक्तिपूजा और सामुदायिक एकजुटता के प्रतीक के रूप में किया जाता है। इस परंपरा के तहत ठेचो से नवदुर्गा भगवती को मंगलबाजार लाया जाता है और मानमानेश्वरी देवी को फूल अर्पित किए जाते हैं।
मानमानेश्वरी पायो जात्रा प्रबंधन समिति के सदस्य माधवश्याम शर्मा ने बताया कि मानमानेश्वरी देवी के निमंत्रण पर ठेचो से नवदुर्गा को मंगलबाजार लाने की प्रथा लंबे समय से चली आ रही है।
इस परंपरा में नवदुर्गा के देवगण मंगलबाजार के चौराहे पर मानमानेश्वरी भवानी से मिलते हैं और उन्हें माला पहनाते हैं। इसके बाद नवदुर्गा की ओर से भैरव, बाराही और काली देवी उन्हें फूल अर्पित करती हैं और विमिरो नामक बड़े नींबू जैसे फल की भेंट देती हैं।
समिति के सदस्य शर्मा के अनुसार, अष्टमातृका और नवदुर्गा के बीच सास-बहू जैसा संबंध माना जाता है। विजयादशमी और कोजाग्रत पूर्णिमा पर होने वाला यह नृत्य लिच्छवी काल की सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा है।
इस वर्ष ऐतिहासिक मूलचोक में देवगणों ने प्राचीन शैली और पारंपरिक विधियों के अनुसार प्रस्तुति दी। नृत्य से पहले 11 देवगणों, तीन नायकों और अन्य गुठियारों सहित कुल 34 लोगों ने देवता घर में विशेष पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
यह परंपरा लिच्छवी राजा मानदेव की इष्टदेवी मनमानेश्वरी, जिन्हें प्राचीन तलेजु से भी जोड़ा जाता है, से संबंधित है। पाटन की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा यह आयोजन आज भी पुरानी विरासत को जीवित रखे हुए है।
स्थानीय निवासी सुनील महर्जन के अनुसार, हर साल होने वाला यह पारंपरिक नृत्य नई पीढ़ी को प्राचीन सभ्यता और सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।













