बॉलीवुड
17 Apr, 2026

अक्षय कुमार की कॉमिक टाइमिंग के बावजूद फीकी पड़ी ‘भूत बंगला’ की कहानी

‘भूत बंगला’ प्रियदर्शन और अक्षय कुमार की हॉरर-कॉमेडी फिल्म है, जिसमें कहानी और प्रस्तुति का संतुलन कमजोर है, जिससे यह उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती और औसत प्रभाव छोड़ती है।

मुंबई, 13 अप्रैल।

‘भूत बंगला’ को लेकर सबसे बड़ी चुनौती यही रहती है कि जब भी प्रियदर्शन और अक्षय कुमार की जोड़ी साथ आती है, दर्शकों की अपेक्षाएं स्वतः ही काफी बढ़ जाती हैं। ‘हेरा फेरी’, ‘गरम मसाला’ और ‘भागम भाग’ जैसी फिल्मों ने इस जोड़ी के लिए एक अलग मानक स्थापित किया था, लेकिन ‘भूत बंगला’ देखने पर लगातार यह महसूस होता है कि फिल्म उस स्तर को छूने की कोशिश करने के बजाय केवल उसकी याद दिलाकर आगे बढ़ती है।

फिल्म की कहानी अर्जुन के इर्द-गिर्द केंद्रित है, जो लंदन से अपने पैतृक महल मंगलपुर लौटता है ताकि अपनी बहन मीरा की शादी करवा सके। हालांकि यह महल साधारण नहीं है और गांव में इससे जुड़ी डरावनी कहानियां पहले से प्रचलित हैं। शादी की तैयारियों के बीच महल में रहस्यमयी घटनाएं शुरू हो जाती हैं, जिनमें अजीब आवाजें, अनहोनी घटनाएं और छिपे हुए राज शामिल हैं। शुरुआत में कहानी रोचक लगती है, लेकिन आगे बढ़ने पर फिल्म यह तय नहीं कर पाती कि इसे हॉरर बनाना है या कॉमेडी। सबसे बड़ी कमी यह है कि घटनाओं के बावजूद उनके पीछे की वजहें प्रभावी रूप से सामने नहीं आ पातीं।

अभिनय की बात करें तो अक्षय कुमार पूरी फिल्म को संभालने का प्रयास करते हैं और कई जगह उनकी कॉमिक टाइमिंग असरदार भी लगती है, लेकिन उनका अंदाज काफी परिचित महसूस होता है। राजपाल यादव कुछ हल्के और स्वाभाविक दृश्यों से माहौल को संभालते हैं और कई जगहों पर फिल्म को राहत देते हैं। वामिका गब्बी सहज नजर आती हैं, लेकिन उनके किरदार को पूरी तरह विकसित नहीं किया गया है। तब्बू दूसरे हिस्से में कहानी को गंभीरता देने की कोशिश करती हैं, लेकिन कमजोर लेखन उन्हें प्रभाव छोड़ने का पूरा अवसर नहीं देता।

सहायक कलाकारों में परेश रावल और मनोज जोशी जैसे नाम मौजूद हैं, लेकिन उनके हिस्से में यादगार दृश्य नहीं आते। असरानी कुछ दृश्यों में हल्की मुस्कान जरूर लाते हैं, जिससे फिल्म कुछ पल के लिए बेहतर महसूस होती है।

निर्देशन के स्तर पर प्रियदर्शन कुछ दृश्यों में अपनी पुरानी पकड़ दिखाते हैं, लेकिन पूरी फिल्म एक संतुलित लय नहीं बना पाती। स्क्रीनप्ले सबसे कमजोर पक्ष साबित होता है। स्लैपस्टिक कॉमेडी बार-बार दोहराई जाती है और दूसरा हिस्सा अचानक गंभीर होकर भी प्रभाव नहीं छोड़ पाता। संवाद सामान्य हैं, लेकिन उनमें वह धार नहीं है जो इस जोड़ी की फिल्मों की पहचान रही है। कई हास्य दृश्य लिखित अधिक और स्वाभाविक कम प्रतीत होते हैं।

अंततः ‘भूत बंगला’ पूरी तरह असफल नहीं कही जा सकती, लेकिन यह उतनी मनोरंजक भी नहीं है जितनी उम्मीद की गई थी। बिना अधिक अपेक्षाओं के देखने पर यह एक बार देखी जा सकने वाली फिल्म है, लेकिन अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की पुरानी कॉमेडी शैली की तलाश करने वालों को निराशा मिल सकती है।

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