रायपुर, 27 मार्च
“शायद वह अभी निर्माण स्थल पर व्यस्त होंगे,” मोनिखा सोनोवाल मुस्कुराते हुए कहती हैं, जब वह अपने पिता को फोन करने की कोशिश कर रही थीं। कुछ ही पल पहले 19 वर्षीय मोनिखा ने खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 में महिलाओं के 48 किलोग्राम वेटलिफ्टिंग वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर यह खुशखबरी अपने पिता तक पहुंचाना चाही।
उनके पिता पद्मधर सोनोवाल, जो एक राजमिस्त्री हैं, पूरे परिवार का पालन-पोषण करने के लिए दिनभर मेहनत करते हैं। मोनिखा की खेल यात्रा में उनके पिता हमेशा उनके सबसे बड़े सहायक और प्रेरक रहे हैं।
दो बहनों में बड़ी मोनिखा असम के धेमाजी जिले के बटघोरिया पेनबेनी चौक की निवासी हैं। ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी किनारे बसे इस शांत इलाके की गुवाहाटी से दूरी लगभग 425 किलोमीटर है। यहां जीवन सरल और शांति पूर्ण है, जहां ज्यादातर परिवारों के सपने रोजमर्रा की जरूरतों तक ही सीमित रहते हैं।
मोनिखा के लिए वेटलिफ्टिंग हॉल में बारबेल की आवाज़ ने एक नए सपने की शुरुआत की, जो किसी सीमा में बंधने को तैयार नहीं था। सीमित संसाधनों के बावजूद खेल के प्रति उनकी रुचि धीरे-धीरे जुनून में बदल गई, और इसके लिए उन्होंने मणिपुर की टोक्यो ओलंपिक रजत पदक विजेता मीराबाई चानू से प्रेरणा ली।
गुरुवार को वह सपना हकीकत बन गया, जब मोनिखा ने घुटने की चोट के बावजूद कठिन मेहनत करते हुए खेलों का पहला वेटलिफ्टिंग स्वर्ण पदक अपने नाम किया। यह जीत उनके वर्षों के संघर्ष और समर्पण का परिणाम थी।
उनकी खेल यात्रा में बड़ा मोड़ दो साल पहले आया, जब उन्होंने भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के नेशनल सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस (NCOE) ईटानगर में प्रशिक्षण शुरू किया। कचारी जनजाति की मोनिखा ने कहा, “एनसीओई ईटानगर ने मुझे वह सब कुछ दिया, जिसकी कल्पना मेरे जैसे छोटे गांव की खिलाड़ी केवल कर सकती थीं—बेहतर ट्रेनिंग, पोषण, मार्गदर्शन और चोट से उबरने की सुविधा। इसके बिना यहां तक पहुंचना बहुत कठिन था।”
इसके बाद उनकी प्रगति लगातार जारी रही। 2023 में स्कूल नेशनल्स में उन्होंने स्वर्ण पदक जीता। 2024 में ओडिशा के संबलपुर में खेलो इंडिया अस्मिता लीग में रजत पदक हासिल किया। 2025 में तेजपुर में राज्य चैंपियनशिप में कांस्य पदक और चंडीगढ़ में इंटर-यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप में आठवां स्थान प्राप्त किया।
इस उपलब्धि तक पहुंचना आसान नहीं था। पिछले तीन महीनों से मोनिखा अपने दाहिने घुटने की चोट से जूझ रही थीं, जो उन्हें ट्रेनिंग के दौरान लगी थी।
चोट को देखते हुए उनके कोचों ने उन्हें खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में भाग न लेने की सलाह दी, लेकिन मोनिखा ने दर्द के बावजूद मैदान में उतरना तय किया।
मोनिखा ने कहा, “कोच मेरे घुटने को लेकर चिंतित थे और आराम करने की सलाह दी। लेकिन खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स जैसे मौके बार-बार नहीं आते। मैं इस बड़े मंच पर खेलने का मौका नहीं छोड़ सकती थी।”
उन्होंने आगे कहा, “मैं लगातार बेहतर बनना चाहती हूं और एक दिन भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहती हूं। यह स्वर्ण पदक तो बस शुरुआत है।”












