मेलबर्न, 20 अप्रैल।
ऑस्ट्रेलिया और जापान के बीच रक्षा सहयोग को नई मजबूती देते हुए दोनों देशों ने 7 अरब डॉलर के युद्धपोत सौदे के तहत पहले तीन जहाजों के निर्माण के लिए अनुबंध पर हस्ताक्षर किए हैं। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बदलते सुरक्षा परिदृश्य के बीच यह समझौता दोनों देशों के बीच बढ़ते सामरिक तालमेल का संकेत माना जा रहा है।
मेलबर्न में आयोजित समारोह के दौरान ऑस्ट्रेलिया के रक्षा मंत्री रिचर्ड मार्लेस और जापान के रक्षा मंत्री कोइजुमी शिंजीरो ने मोगामी श्रेणी के युद्धपोतों के लिए इस समझौते की घोषणा की। इस अवसर पर दोनों देशों के बीच ‘मोगामी मेमोरेंडम’ के जरिए रक्षा क्षेत्र में औद्योगिक सहयोग और सैन्य समन्वय को और मजबूत करने पर सहमति बनी।
समझौते के अनुसार जापान की मित्सुबिशी हेवी इंडस्ट्रीज दक्षिणी नागासाकी क्षेत्र में तीन स्टेल्थ फ्रिगेट तैयार करेगी, जबकि ऑस्ट्रेलिया की कंपनी ऑस्टल पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में आठ जहाजों का निर्माण करेगी। जापान में निर्मित पहला युद्धपोत वर्ष 2029 तक तैयार होने और 2030 में सेवा में शामिल होने की संभावना है।
ऑस्ट्रेलिया के रक्षा मंत्री ने कहा कि पिछले कई दशकों में उनकी नौसेना की सतह बेड़े की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण कभी नहीं रही। उन्होंने कहा कि ये बहुउद्देश्यीय फ्रिगेट समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और उत्तरी सीमाओं की निगरानी में अहम भूमिका निभाएंगे, जिससे नौसैनिक क्षमता और मजबूत होगी।
जापान के रक्षा मंत्री ने भी कहा कि मौजूदा समय में सुरक्षा वातावरण लगातार चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है, ऐसे में दोनों देशों के बीच रक्षा समन्वय का महत्व बढ़ गया है। उन्होंने संकेत दिया कि साझा सुरक्षा चिंताओं के चलते यह सहयोग आगे और गहराएगा।
ऑस्ट्रेलिया सरकार ने पिछले वर्ष ही मित्सुबिशी हेवी इंडस्ट्रीज को अगली पीढ़ी के युद्धपोतों के निर्माण के लिए चुना था, जिसमें जर्मनी की कंपनी के साथ प्रतिस्पर्धा रही थी। इसके साथ ही ऑस्ट्रेलिया ने अगले दशक में 305 अरब डॉलर के रिकॉर्ड रक्षा खर्च की योजना बनाई है, जिसका उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से सबसे मजबूत नौसैनिक क्षमता विकसित करना है।
एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बदलते हालात और चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंताओं के बीच ऑस्ट्रेलिया और जापान ने हाल के वर्षों में अपने सैन्य सहयोग को तेजी से बढ़ाया है। दोनों देश अमेरिका के करीबी सहयोगी हैं और क्वाड समूह का भी हिस्सा हैं, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग को नई दिशा मिल रही है।







