वॉशिंगटन, 26 मई ।
अमेरिका में अमेरिकी सीनेटर पैटी मरे द्वारा कार्यवाहक अटॉर्नी जनरल से राष्ट्रपति ट्रंप से जुड़े 1.8 बिलियन डॉलर के कथित वित्तीय घोटाले को लेकर की गई तीखी पूछताछ ने एक बार फिर उस असहज सत्य को उजागर कर दिया है, जिसे दुनिया भर का आम नागरिक भीतर ही भीतर महसूस करता है — सत्ता धीरे-धीरे जवाबदेही से ऊपर उठती जा रही है।
वॉशिंगटन हो, मॉस्को, दिल्ली, बीजिंग, इस्लामाबाद या लंदन — लोकतंत्र, संविधान, न्यायिक संस्थाओं और जवाबदेही की बात करने वाली व्यवस्थाएँ कागज़ों पर भले ही मजबूत दिखाई दें, लेकिन सत्ता, धन, कॉरपोरेट प्रभाव और राजनीतिक संरक्षण के सामने वे अक्सर असहाय नजर आती हैं। फर्क केवल इतना होता है कि धनराशि कितनी बड़ी है और उसका प्रभाव कितना व्यापक।
आम आदमी देखता है, पढ़ता है और प्रतिक्रिया देता है। कुछ समय तक सोशल मीडिया पर बहस चलती है, टीवी स्टूडियो गरजते हैं, विशेषज्ञ विश्लेषण करते हैं और राजनीतिक दल अपने-अपने हितों के अनुसार नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं। फिर सब सामान्य हो जाता है। सत्ता फिर सत्ता बनी रहती है।
आज का नागरिक शायद इतिहास में सबसे अधिक सूचनाओं से घिरा हुआ है, लेकिन उतना ही अधिक स्वयं को असहाय भी महसूस कर रहा है। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में जांच एजेंसियों पर कभी कमजोर होने तो कभी चयनात्मक कार्रवाई करने के आरोप लगते हैं। अदालतें कभी लोकतंत्र की अंतिम उम्मीद के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं, तो कभी प्रक्रियात्मक देरी के प्रतीक के रूप में देखी जाती हैं। विपक्ष में रहते हुए राजनीतिक दल भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते हैं, लेकिन सत्ता में आते ही वही व्यवस्थाएँ उनके लिए सुविधाजनक हो जाती हैं।
यह संकट केवल किसी एक नेता, एक देश या एक विचारधारा का नहीं है। यह विश्वव्यापी विश्वसनीयता संकट है। सबसे भयावह बात यह है कि जनाक्रोश अब जरूरी नहीं कि जनपरिणाम में बदल सके।
एक समय था जब किसी घोटाले का खुलासा स्वयं में नैतिक दबाव बनाता था। आज घोटाले भी कंटेंट बन चुके हैं। मीडिया आक्रोश को बेचता है और कुछ घंटों बाद किसी नए विवाद की ओर बढ़ जाता है। लगातार दोहराव ने लोकतांत्रिक संवेदनशीलता को सुन्न करना शुरू कर दिया है।
जब आम नागरिक यह मानने लगे कि “कुछ बदलने वाला नहीं है”, तब लोकतंत्र भीतर से खोखला होने लगता है। भागीदारी कम होती है, विश्वास टूटता है और निंदकता ही व्यावहारिक बुद्धिमत्ता प्रतीत होने लगती है। यही मौन मोहभंग आज दुनिया के अनेक समाजों में दिखाई देता है।
स्थानीय प्रशासनिक तंत्र से जूझता किसान, महंगाई और कर व्यवस्था के बीच फंसा मध्यम वर्ग, जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए दबाव झेलता पत्रकार, चयनात्मक कार्रवाई का शिकार उद्यमी और वह युवा नागरिक, जो लगातार यह देख रहा है कि विशेषाधिकार सिद्धांतों पर भारी पड़ रहे हैं — सभी किसी न किसी रूप में इसी मानसिक थकान का अनुभव कर रहे हैं।
विडंबना यह है कि हर राजनीतिक व्यवस्था अपनी वैधता का स्रोत “जनता” को बताती है, लेकिन वही जनता अक्सर उन निर्णयों की केवल दर्शक बनकर रह जाती है, जो उसके आर्थिक भविष्य, स्वतंत्रता और सामाजिक वास्तविकताओं को प्रभावित करते हैं। जवाबदेही की वास्तविकता से अधिक उसका प्रदर्शन दिखाई देने लगा है। टीवी बहसें, अदालतों की कार्यवाही, एजेंसियों की छापेमारी, संसद के हंगामे और अंतहीन डिजिटल विमर्श — यह सब मिलकर कार्रवाई का एक दृश्य तो निर्मित करते हैं, लेकिन आम नागरिक अब एक बुनियादी प्रश्न पूछने लगा है — क्या वास्तव में शीर्ष पर बैठे लोगों के लिए कुछ बदलता भी है?
लेकिन समस्या अब केवल भ्रष्टाचार या सत्ता के केंद्रीकरण तक सीमित नहीं रह गई है। धीरे-धीरे जनमत स्वयं निर्मित, नियंत्रित और भावनात्मक रूप से संचालित किया जाने लगा है। चुनाव अब केवल विचारधाराओं, नीतियों या शासन के आधार पर नहीं जीते जाते; उन्हें डिजिटल प्रभाव तंत्र, सेलिब्रिटी संस्कृति, सोशल मीडिया एल्गोरिद्म, नैरेटिव निर्माण और भावनात्मक अभियानों द्वारा भी आकार दिया जा रहा है।
तमिलनाडु में अभिनेता-राजनेता विजय और उनकी पार्टी की चुनावी सफलता इस बदलते लोकतांत्रिक परिदृश्य का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह सही है कि तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से सिनेमा और जननेताओं के प्रभाव से संचालित होती रही है, लेकिन इसके बावजूद यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि राजनीतिक रूप से जागरूक और सामाजिक रूप से विकसित राज्य में भी आधुनिक प्रभाव तंत्र मतदाताओं की सोच को व्यापक रूप से प्रभावित करने में सक्षम दिखाई दे रहे हैं।
यह किसी व्यक्ति विशेष के समर्थन या विरोध का प्रश्न नहीं है। यह लोकतांत्रिक राजनीति के बदलते स्वरूप की ओर संकेत है। आज मतदाता केवल घोषणापत्रों या विचारधाराओं से प्रभावित नहीं होता। उसकी सोच निरंतर सोशल मीडिया, प्रभावशाली चेहरों, दृश्य प्रतीकों और योजनाबद्ध नैरेटिव के माध्यम से आकार दी जा रही है। राजनीति अब मनोवैज्ञानिक संचार के युग में प्रवेश कर चुकी है।
चिंता इस बात की नहीं है कि लोग लोकतांत्रिक विकल्प चुन रहे हैं। चिंता इस बात की है कि क्या वे विकल्प विवेकपूर्ण राजनीतिक समझ के आधार पर लिए जा रहे हैं, या फिर ऐसी सुनियोजित धारणा-निर्माण प्रक्रिया के प्रभाव में, जो तर्क और आलोचनात्मक सोच को पीछे छोड़ देती है।
इतिहास बताता है कि समाज केवल भ्रष्टाचार से नहीं टूटते। वे तब कमजोर पड़ते हैं, जब जनता यह विश्वास खो देती है कि व्यवस्था के भीतर रहकर सुधार संभव है। आज दुनिया के अनेक लोकतंत्र शायद उसी मोड़ पर खड़े दिखाई देते हैं।
भारत में भी स्थिति संवेदनशील है, भले ही हमारी सभ्यतागत चेतना और संस्थागत निरंतरता अभी तक इस संरचना को संभाले हुए हैं। हमारा राजनीतिक ढांचा जातीय समीकरणों, धार्मिक पहचानों, भाषाई विविधताओं, क्षेत्रीय आकांक्षाओं और आर्थिक हितों के बीच एक नाजुक संतुलन पर टिका हुआ है। एक मजबूत और स्वतंत्र सेना इस लोकतांत्रिक संरचना को बाहरी आक्रमणों और आंतरिक विघटन से सुरक्षित रखने वाली महत्वपूर्ण शक्तियों में रही है।
भारत ने पिछले एक हजार वर्षों में अनेक राजनीतिक और सभ्यतागत उतार-चढ़ाव देखे हैं, जिन्होंने इस उपमहाद्वीप की राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संरचनाओं को गहराई से प्रभावित किया। इसी के साथ भारत भी सामाजिक मूल्यों के क्षरण, सामुदायिक जीवन की कमजोर पड़ती संरचना और प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व की उस परंपरा के टूटने का सामना कर रहा है, जो कभी इसकी सभ्यतागत आत्मा मानी जाती थी।
सनातन चिंतन द्वारा प्रतिपादित सहिष्णुता और सह-अस्तित्व की संस्कृति आज उपभोक्तावाद, तकनीकी अति-उत्तेजना, वैचारिक ध्रुवीकरण और अनियंत्रित मानवीय प्रवृत्तियों की चुनौती से जूझ रही है। दर्शन, आत्मसंयम और नैतिक विवेक की भूमिका लगातार कमजोर पड़ती दिखाई देती है।
मानवता आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी प्रतीत होती है, जहाँ भौतिक प्रगति और डिजिटल जुड़ाव के बावजूद भीतर गहरी अस्थिरता और आत्म-विनाश की आशंका मौजूद है। फिर भी इतिहास यह भी सिखाता है कि गहरे संक्रमण के दौर कभी-कभी एक नए संतुलन को जन्म देते हैं। उम्मीद केवल इतनी है कि वर्तमान अव्यवस्था से अंततः कोई अधिक संतुलित, अधिक मानवीय और अधिक विवेकपूर्ण व्यवस्था जन्म ले सके।













