भोपाल, 04 जून।
अगले वर्ष होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए 2029 लोकसभा चुनाव का लिटमस टेस्ट बन गए हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा और पंजाब की कुल 690 विधानसभा सीटों पर जीत के लिए पार्टी ने बूथ स्तर तक 'मिशन मोड' में काम शुरू कर दिया है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि राह आसान नहीं, बल्कि चुनौतियों से भरी हुई है।
राज्यों के स्कोरकार्ड पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश सबसे महत्वपूर्ण राज्य है। 2017 में भाजपा ने 312 सीटें जीती थीं, जबकि 2022 में यह संख्या घटकर 255 रह गई। यानी 57 सीटों का नुकसान हुआ। 2024 लोकसभा चुनाव में भी पार्टी को 33 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा। समाजवादी पार्टी 111 सीटों के साथ मजबूत स्थिति में है। यदि सपा, कांग्रेस और रालोद साथ आते हैं, तो 2017 जैसा प्रचंड बहुमत दोहराना आसान नहीं होगा। चुनौती यह भी है कि लगभग 30 प्रतिशत मौजूदा विधायकों के खिलाफ सत्ता विरोधी माहौल की चर्चा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के बीच मतभेदों की खबरें भी समय-समय पर सामने आती रही हैं।
उत्तराखंड में भाजपा के सामने 'रिवाज' तोड़ने की चुनौती है। 2017 में पार्टी को 57 और 2022 में 47 सीटें मिली थीं। राज्य गठन के बाद से कोई भी दल लगातार दो बार सत्ता में नहीं लौटा है। पांच वर्षों में तीन मुख्यमंत्री बदल चुके हैं। कांग्रेस के पास 19 सीटें हैं। पार्टी के भीतर विभिन्न खेमों की सक्रियता भी एक चुनौती मानी जा रही है।
मणिपुर में 2017 की 21 सीटों के मुकाबले 2022 में भाजपा 32 सीटों तक पहुंची थी। लेकिन मई 2023 से जारी मैतेई-कुकी हिंसा ने राजनीतिक परिस्थितियों को अत्यंत जटिल बना दिया है। कई क्षेत्रों में अब भी तनाव बना हुआ है। ऐसे में चुनाव से पहले शांति बहाली सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी।
गोवा में स्थिति हमेशा की तरह बेहद संवेदनशील है। 2022 में भाजपा 20 सीटों पर जीत दर्ज कर बहुमत से मात्र एक सीट दूर रह गई थी। सरकार सहयोगी दलों और निर्दलीयों के समर्थन से चल रही है। यहां दल-बदल की राजनीति और टिकट वितरण हमेशा बड़ा कारक रहते हैं।
पंजाब भाजपा के लिए सबसे कठिन मैदान माना जा रहा है। 2017 में पार्टी को तीन और 2022 में केवल दो सीटें मिली थीं। आम आदमी पार्टी के पास 92 सीटों का विशाल बहुमत है। किसान आंदोलन के बाद ग्रामीण सिख वोट बैंक में भाजपा की स्थिति कमजोर मानी जाती है। अकाली दल के साथ भविष्य के संबंध भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहेंगे।
इन चुनौतियों के बीच भाजपा ने बूथ प्रबंधन, संगठन विस्तार और केंद्रीय योजनाओं के लाभार्थियों तक पहुंच बढ़ाने की रणनीति बनाई है। उत्तर प्रदेश में बूथों का पुनर्गठन किया जा रहा है और बड़ी संख्या में मौजूदा विधायकों के टिकट काटे जाने की संभावना जताई जा रही है। पार्टी सत्ता विरोधी माहौल को कम करने के लिए नए चेहरों पर भी दांव लगा सकती है।
हालांकि, भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष से अधिक आंतरिक गुटबाजी है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मणिपुर में विभिन्न गुटों के बीच खींचतान की चर्चाएं लगातार होती रही हैं। 2024 के चुनाव परिणामों के बाद से ही संगठनात्मक एकजुटता पर विशेष जोर दिया गया है।
इन पांच राज्यों की 690 विधानसभा सीटों का परिणाम केवल राज्य सरकारों का भविष्य तय नहीं करेगा, बल्कि 2029 लोकसभा चुनाव की राजनीतिक दिशा भी प्रभावित करेगा। भाजपा के पास मजबूत संगठन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व और कल्याणकारी योजनाओं का आधार है, लेकिन सत्ता विरोधी रुझान, गुटबाजी और स्थानीय असंतोष जैसी चुनौतियां भी कम नहीं हैं। ऐसे में 'मिशन-2026' भाजपा के लिए केवल चुनावी अभियान नहीं, बल्कि एक कठिन राजनीतिक परीक्षा है।











