संपादकीय
21 Mar, 2026

ईरान की सैन्य क्षमता और वैश्विक शक्ति संतुलन: दावों और वास्तविकता के बीच

मध्य पूर्व में अमेरिका और इजरायल के हमलों के बावजूद ईरान की सैन्य प्रतिक्रिया और रणनीतिक गठबंधन वैश्विक शक्ति संतुलन और जटिल युद्ध परिदृश्य को दर्शाते हैं।

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप द्वारा किए गए दावे—कि अमेरिका ने ईरान की 90% सैन्य क्षमता नष्ट कर दी है—एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। इन दावों में ईरान की जल, थल और वायु सेना के कमजोर होने, मिसाइल भंडार खत्म होने और नेतृत्वहीन होने जैसी बातें शामिल थीं। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल और बहुआयामी नजर आती है। ईरान की लगातार जवाबी कार्रवाई यह संकेत देती है कि स्थिति इतनी एकतरफा नहीं है, जितनी बताई जा रही है।
अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर लगातार हमले किए जाने के बावजूद उसका सैन्य ढांचा पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुआ है। यदि ट्रंप के दावे पूरी तरह सही होते, तो ईरान इतनी संगठित और प्रभावी प्रतिक्रिया देने में सक्षम नहीं होता। ईरान ने न केवल अपनी रक्षा क्षमताओं को बनाए रखा है, बल्कि वह आक्रामक जवाब देने में भी सक्षम दिख रहा है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या अमेरिकी आकलन वास्तविकता से दूर थे या फिर ईरान की क्षमताओं को कम करके आंका गया था।
ईरान लंबे समय से असममित युद्ध की रणनीति अपनाता रहा है। इसका अर्थ है कि वह पारंपरिक युद्ध के बजाय गुरिल्ला युद्ध, प्रॉक्सी समूहों तथा मिसाइल और ड्रोन तकनीक के माध्यम से अपने विरोधियों को चुनौती देता है। ईरान की सैन्य संरचना केवल उसकी नियमित सेना तक सीमित नहीं है; उसके पास कई क्षेत्रीय सहयोगी और गैर-राज्य अभिनेता भी हैं, जो उसकी रणनीतिक गहराई को बढ़ाते हैं। यही कारण है कि सीधे हमलों के बावजूद उसकी जवाबी क्षमता बनी रहती है।
हाल के समय में चीन और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य और आर्थिक संबंधों को लेकर कई अटकलें लगाई जा रही हैं। कुछ रिपोर्टों में यह दावा किया गया है कि चीन ईरान को ड्रोन तकनीक, रॉकेट ईंधन और अन्य सैन्य संसाधन उपलब्ध करा रहा है। साथ ही, सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम के जरिए सटीक हमलों में मदद की बात भी कही जाती है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि करना मुश्किल है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अक्सर इस तरह की सूचनाएं रणनीतिक दबाव बनाने के लिए भी सामने लाई जाती हैं। फिर भी, चीन और ईरान के बीच आर्थिक और तकनीकी सहयोग से इन संभावनाओं को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
ईरान को केवल चीन ही नहीं, बल्कि अन्य देशों और समूहों से भी अप्रत्यक्ष समर्थन मिलने की संभावना जताई जाती है। रूस जैसे देशों के साथ उसके संबंध पहले से ही मजबूत रहे हैं। इसके अलावा, मध्य पूर्व के कुछ गैर-राज्य समूह भी ईरान के प्रभाव क्षेत्र में आते हैं। यह “शैडो सपोर्ट” (गोपनीय सहयोग) ईरान की सैन्य क्षमता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस प्रकार का सहयोग अक्सर खुले तौर पर सामने नहीं आता, लेकिन युद्ध की दिशा को प्रभावित करता है।
अमेरिका और इजरायल की रणनीति मुख्यतः ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमताओं को कमजोर करने पर केंद्रित रही है। इसके तहत साइबर हमले, हवाई हमले और लक्षित ऑपरेशन शामिल हैं। लेकिन इन प्रयासों के बावजूद, ईरान की सैन्य संरचना पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुई है। इसका कारण उसकी विकेंद्रीकृत संरचना और स्थानीय स्तर पर मजबूत नेटवर्क हो सकता है।
इस पूरे परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण पहलू सूचना युद्ध भी है। जब कोई बड़ा नेता यह दावा करता है कि विरोधी की 90% सैन्य क्षमता खत्म हो गई है, तो इसका उद्देश्य केवल तथ्य बताना नहीं होता, बल्कि मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल करना भी होता है। ट्रंप के बयान को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। इस तरह के दावे घरेलू राजनीति, अंतरराष्ट्रीय समर्थन और विरोधी के मनोबल को प्रभावित करने के लिए किए जाते हैं।
यह मान लेना कि ईरान पूरी तरह अकेले अमेरिका और इजरायल का सामना कर रहा है, स्थिति को अत्यधिक सरल बनाना होगा। आधुनिक युद्ध केवल दो देशों के बीच नहीं होता, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन, आर्थिक हितों और रणनीतिक गठबंधनों का परिणाम होता है। ईरान के पास भले ही औपचारिक सैन्य गठबंधन न हो, लेकिन उसके पास कई स्तरों पर सहयोग और समर्थन मौजूद हो सकता है—चाहे वह तकनीकी हो, आर्थिक हो या रणनीतिक।
मध्य पूर्व की वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि युद्ध और सैन्य क्षमता का आकलन केवल प्रत्यक्ष हमलों और आधिकारिक बयानों के आधार पर नहीं किया जा सकता। डोनाल्ड ट्रंप के दावे और जमीनी वास्तविकता के बीच का अंतर यह बताता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सच्चाई अक्सर बहुस्तरीय होती है। ईरान की लगातार जवाबी कार्रवाई यह संकेत देती है कि वह अभी भी एक महत्वपूर्ण सैन्य शक्ति बना हुआ है। चाहे उसे बाहरी समर्थन मिल रहा हो या उसकी अपनी रणनीतिक क्षमता मजबूत हो, यह स्पष्ट है कि संघर्ष का यह अध्याय अभी खत्म नहीं हुआ है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह तनाव और बढ़ेगा या कूटनीतिक प्रयास इसे कम करने में सफल होंगे। फिलहाल, यह संघर्ष वैश्विक शक्ति संतुलन की एक जटिल तस्वीर पेश करता है, जहां हर कदम के पीछे कई परतें छिपी होती हैं।
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