वॉशिंगटन, 21 मार्च 2026।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान युद्ध के तीसरे हफ़्ते में ऐसे संकट का सामना कर रहे हैं जो उनके नियंत्रण से बाहर दिखाई दे रहा है, क्योंकि विश्वभर में ऊर्जा की कीमतें बढ़ गई हैं, अमेरिका अपने सहयोगियों से अलग-थलग पड़ गया है और अतिरिक्त सैनिक तैनात करने की तैयारी चल रही है, जबकि उन्होंने कहा था कि यह सिर्फ़ एक "छोटी सी कार्रवाई" होगी।
ट्रंप ने दूसरों को चुनौती देते हुए कहा कि नाटो देशों ने होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा में मदद करने से इनकार किया और उन्हें "कायर" कहा, साथ ही जोर देकर बताया कि अभियान योजना के अनुसार चल रहा है, लेकिन उनका यह दावा कि लड़ाई "सैनिक दृष्टि से जीत गई" थी, वास्तविक हालात से मेल नहीं खाता, क्योंकि ईरान ने खाड़ी के तेल और गैस की सप्लाई रोक दी और पूरे क्षेत्र में मिसाइल हमले किए हैं।
व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने कहा कि कई ईरानी उच्च अधिकारी टारगेटेड किलिंग में मारे गए, अधिकांश नेवी नष्ट हुई और बैलिस्टिक मिसाइल हथियारों का जखीरा काफी हद तक नष्ट किया गया, जिससे यह एक सैन्य सफलता मानी जा सकती है।
पिछले हफ़्ते ट्रंप की पावर की सीमाएं स्पष्ट हुईं। होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा में सहयोगियों और नाटो देशों की अनिच्छा ने उनके लिए रणनीति तय करना मुश्किल कर दिया। विश्लेषकों का कहना है कि यह उनके पिछले पांच वर्षों में गठबंधनों को कम आंकने के फैसलों के खिलाफ विरोध को भी दिखाता है। इज़राइल के साथ मतभेद भी सामने आए, जबकि ट्रंप का कहना है कि साउथ पारस गैस फील्ड पर इज़राइली हमले की जानकारी उन्हें नहीं थी।
एनालिस्ट मानते हैं कि ट्रंप अब ऐसे मोड़ पर हैं जहां कोई स्पष्ट रास्ता नहीं दिखता। वे अमेरिका के हमले को तेज कर सकते हैं, या ईरान के तट पर सैनिक तैनात कर सकते हैं, लेकिन इससे लंबी अवधि की सैन्य प्रतिबद्धता और अमेरिकी जनता के विरोध का खतरा रहेगा। बातचीत से इनकार और रणनीति में अस्पष्टता ने उनके नियंत्रण को कमजोर किया है।
युद्ध ने यह भी दिखाया कि ट्रंप की MAGA मूवमेंट पर पकड़ कमजोर हो रही है। न्यूज़ मीडिया पर उनके हमले और रिपोर्टिंग को "देशद्रोह" करार देना, उनके निराशा के संकेत हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि ट्रंप अब यह नहीं समझ पा रहे हैं कि उन्होंने देश को युद्ध में क्यों धकेला और आगे क्या कदम उठाए जाएँ।











