नई दिल्ली, 24 मार्च।
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने पश्चिम एशिया में जारी सैन्य संघर्ष के कारण उत्पन्न आर्थिक चुनौतियों को लेकर सरकार पर सवाल उठाए हैं और देश की वित्तीय स्थिरता को लेकर स्पष्टता की मांग की है। उन्होंने कहा कि बजट और राजस्व अनुमानों का आधार अब बदल चुका है और सरकार को यह बताना होगा कि इस संकट का भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
तिवारी ने लोकसभा में वित्त विधेयक 2026 पर चर्चा के दौरान कहा कि तेल, एलएनजी, खाद्यान्न और दवाओं की कीमतों में वृद्धि के चलते मई के बाद देश एक नई आर्थिक वास्तविकता का सामना करेगा। उन्होंने बताया कि फरवरी 2026 में भारतीय बास्केट का कच्चा तेल 70 डॉलर प्रति बैरल था, जो मार्च में 119 डॉलर से अधिक हो गया। भारत का कच्चा तेल आयात 2012-13 में 77 प्रतिशत था, जो 2025-26 में 88 प्रतिशत तक पहुंच गया। एलएनजी आयात भी 2013-14 में 29-30 प्रतिशत था, जो 2025-26 में 45-47 प्रतिशत हुआ।
उन्होंने कहा कि तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर की वृद्धि से भारत के राजस्व पर 10 से 15 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। भारत हर साल 150 से 200 अरब डॉलर कच्चे तेल पर खर्च करता है। वित्त वर्ष 2025-26 का बजट 1 फरवरी 2026 को पेश किया गया था, लेकिन 28 फरवरी को अमेरिका और इज़राइल के ईरान पर हमले के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ा।
तिवारी ने यह भी कहा कि देश का कुल कर्ज 2013-14 में 56.51 लाख करोड़ रुपये था, जो 2026 में बढ़कर 214.8 लाख करोड़ रुपये हो गया। केंद्र और राज्यों का सम्मिलित ऋण-से-जीडीपी अनुपात 84.2 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जबकि एफआरबीएम अधिनियम में इसे 60 प्रतिशत तक सीमित रखने का प्रावधान था।
उन्होंने कर संग्रह में भी कमी पर चिंता जताई। अनुमानित 13 प्रतिशत वृद्धि केवल 3 प्रतिशत रही, कॉर्पोरेट टैक्स का अनुमान 9 प्रतिशत था, वृद्धि केवल 7 प्रतिशत हुई, आयकर अनुमान 17 प्रतिशत था, लेकिन केवल 6 प्रतिशत बढ़ा। अप्रत्यक्ष करों में अनुमानित 13 प्रतिशत वृद्धि के बजाय -1 प्रतिशत कमी हुई। कर संग्रह में कमी के कारण सरकार को बाजार से 17 लाख करोड़ रुपये का कर्ज उठाना पड़ा।
तिवारी ने कहा कि 2019-20 में कॉर्पोरेट टैक्स दर में भारी कटौती हुई और आज प्रभावी कॉर्पोरेट टैक्स 18.85 प्रतिशत है, बावजूद इसके निजी निवेश ठप है। भारत की अर्थव्यवस्था अब सार्वजनिक पूंजीगत व्यय पर निर्भर हो गई है, जो 17.14 लाख करोड़ तक पहुंच गया।
उन्होंने मुद्रा और विदेशी निवेश पर भी चिंता जताई। 2014 में रुपया 60.99 प्रति डॉलर था, जो अब बढ़कर 93.34 हो गया। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश भारत से बाहर जा रहे हैं। सितंबर से दिसंबर 2025 तक एफडीआई नकारात्मक रहा, कैपिटल अकाउंट बैलेंस जीडीपी के प्रतिशत के रूप में -6 प्रतिशत और नाममात्र प्रभावी विनिमय दर -7 प्रतिशत है।











