काठमांडू, 31 अक्टूबर।
नेपाल में शुक्रवार देर रात मीडिया संस्थानों पर पुलिस की कार्रवाई और पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने से राजशाही शासन के दौरान प्रेस पर हुए दमन की यादें ताजा हो गई हैं। इस घटनाक्रम ने सरकार और सत्तारूढ़ राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के बीच तालमेल तथा सरकार पर पार्टी के नियंत्रण को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं।
पुलिस ने कई मीडिया संस्थानों के समाचार कक्षों में प्रवेश कर पत्रकारों को हिरासत में लिया। कुछ अन्य पत्रकारों की तलाश किए जाने की भी जानकारी सामने आई। आलोचकों ने इसे संविधान में सुनिश्चित प्रेस स्वतंत्रता के विरुद्ध बताया। सादे कपड़ों में साइबर ब्यूरो और अपराध जांच कार्यालय से पहुंचे पुलिसकर्मियों की गतिविधियों के बाद कुछ पत्रकारों से संपर्क भी नहीं हो पा रहा था।
प्रधानमंत्री कार्यालय ने कार्रवाई की पूर्व जानकारी होने से इनकार किया है। वहीं, प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के करीबी सूत्रों का दावा है कि पुलिस महानिरीक्षक दान बहादुर कार्की ने इसकी पहल की थी। आरोप है कि उन पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को निशाना बनाया गया, जिन्होंने आईजीपी के खिलाफ आलोचनात्मक समाचार प्रकाशित किए थे।
पुलिस सूत्रों के मुताबिक, आईजीपी ने प्रधानमंत्री की टीम के सदस्यों से समन्वय के बाद अधीनस्थ अधिकारियों को निर्देश दिए थे। कथित योजना में पत्रकारों को हिरासत में लेना, उनके उपकरण जब्त करना और समाचारों के स्रोतों का पता लगाना शामिल था। अधिकारियों को निर्देश देते समय प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के आदेशों का हवाला दिए जाने की बात भी सामने आई है।
सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री सचिवालय के प्रभावशाली सदस्यों के साथ मिलकर निशाने पर लिए जाने वाले मीडिया संस्थानों और पत्रकारों की सूची तैयार की गई थी। कार्रवाई का नेतृत्व आईजीपी करते दिखे, लेकिन सरकार के कामकाज में सक्रिय कुछ अन्य लोगों की भूमिका और जानकारी होने के आरोप भी लगाए गए हैं।
कार्रवाई तेज होने के बाद सत्तारूढ़ राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने सरकार के रवैये की आलोचना की। पार्टी ने कहा कि स्वतंत्र प्रेस को डराने, मीडिया संस्थानों की गरिमा कमजोर करने और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर अंकुश लगाने के लिए कानून प्रवर्तन का इस्तेमाल करना लोकतांत्रिक आचरण के अनुरूप नहीं है।
पार्टी प्रवक्ता और पूर्व संचार मंत्री जगदीश खरेल ने देर रात जारी बयान में कहा कि मीडिया को नियंत्रित करने के लिए अधिकृत संस्थाएं पहले से काम कर रही हैं। ऐसे में स्थापित कानूनी और संस्थागत प्रक्रियाओं को छोड़कर पत्रकारों को हिरासत में लेना कानून के शासन का खुला उल्लंघन है और इसे उचित नहीं ठहराया जा सकता।
खरेल ने कहा कि किसी भी बहाने मीडिया संस्थानों को डराने, मानसिक दबाव डालने या उनकी गतिविधियां सीमित करने के प्रयास स्वीकार्य नहीं हैं। उन्होंने संबंधित अधिकारियों से निष्पक्ष, पारदर्शी और तथ्यपरक जांच कर सच्चाई जल्द सार्वजनिक करने तथा गैरकानूनी रूप से हिरासत में रखे गए पत्रकारों को तत्काल, सम्मानपूर्वक और बिना शर्त रिहा करने की मांग की।
पूर्व मंत्री ने मीडिया क्षेत्र के प्रति एकजुटता जताते हुए पत्रकारों से भय, धमकी और अनुचित दबाव के आगे झुके बिना साहस, सच्चाई, तथ्यों और ईमानदारी के साथ काम जारी रखने का आग्रह किया।
प्रधानमंत्री कार्यालय ने शुक्रवार की कार्रवाई से किसी भी तरह की जिम्मेदारी होने से इनकार किया है। इस घटनाक्रम ने सरकार और सत्तारूढ़ दल के बीच तनाव को सामने ला दिया है। सवाल उठ रहा है कि वरिष्ठ पार्टी नेता के नेतृत्व में मंत्रिमंडल बनने के बावजूद क्या राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का सरकार पर नियंत्रण कमजोर पड़ गया है।
पुलिस कार्रवाई की वकीलों और मीडिया अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने भी आलोचना की है। मुख्य विपक्षी नेपाली कांग्रेस, सीपीएन-यूएमएल और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं ने इसे निंदनीय बताया है।
नेपाल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय प्रसाद मिश्र ने कहा कि यह घटना राजशाही शासन की याद दिलाती है और सरकार के लिए ऐसे दमनकारी कदम उठाना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को गिरफ्तार या प्रताड़ित करके दुनिया में कहीं भी कोई सरकार सफल नहीं हुई है।
नेपाल बार एसोसिएशन के पूर्व उपाध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता टीकाराम भट्टराई ने मीडिया संस्थानों पर छापों को राजा ज्ञानेन्द्र के शासनकाल के दमन से भी गंभीर बताया। उन्होंने सोशल मीडिया पर इसे असंवैधानिक, संवैधानिक सर्वोच्चता और कानून के शासन के विरुद्ध तथा लोकतंत्र को कमजोर करने वाला कदम बताया।
भट्टराई ने कहा कि गिरफ्तार पत्रकारों की रिहाई ही एकमात्र मुद्दा नहीं है। हर जागरूक नागरिक को ऐसी सरकार और उसके रवैये के खिलाफ आवाज उठाते हुए लोकतंत्र की रक्षा के लिए आगे आना चाहिए।
बीते साल एक फरवरी को राजा ज्ञानेन्द्र द्वारा प्रत्यक्ष सत्ता अपने हाथ में लेने के बाद सशस्त्र सैनिकों को मीडिया संस्थानों में तैनात किया गया था। समाचारों के प्रकाशन और प्रसारण पर सेंसरशिप लगाई गई तथा कुछ संस्थानों के उपकरण जब्त किए गए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने राजशाही सरकार की कार्रवाइयों के खिलाफ कई आदेश जारी किए थे। तब से मीडिया पर सरकारी दमन की चर्चा में राजशाही शासन के आचरण से तुलना की जाती रही है।
नेपाल पत्रकार महासंघ के पूर्व अध्यक्ष शिव गांवले ने संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा का हवाला देते हुए कहा कि समाचारों के स्रोतों की पहचान के लिए पुलिस का समाचार कक्ष में प्रवेश करना संवैधानिक व्यवस्था के पूरी तरह ध्वस्त होने जैसा है। उनके अनुसार, यदि पुलिस स्रोतों का पता लगाने के नाम पर पत्रकारों को गिरफ्तार करने लगे, तो संविधान प्रभावी रूप से समाप्त हो चुका है। उन्होंने कहा कि प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के साथ अब संविधान बचाने के लिए भी संघर्ष करना होगा।
प्रेस काउंसिल नेपाल ने प्रकाशित समाचारों को लेकर पत्रकारों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की निंदा की है। परिषद ने कहा कि पुलिस मुख्यालय के बयान की पृष्ठभूमि में यह घटना प्रेस स्वतंत्रता और पत्रकारों की पेशेवर सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठाती है। परिषद ने सरकार, पुलिस प्रशासन और संबंधित पक्षों से समाचारों से जुड़े विवादों का समाधान पुलिस तैनात करने के बजाय स्थापित प्रक्रियाओं के माध्यम से करने का आग्रह किया।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के सचिव रमन कर्ण ने पुलिस कार्रवाई को अभिव्यक्ति और प्रेस स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का प्रयास बताया। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा पुलिस के इस्तेमाल से संविधान कमजोर होता है। पत्रकारों को तथ्यों के सामने लाने के लिए छापों और हिरासत का सामना करना पड़े, तो कानून के शासन का अर्थ ही सवालों में पड़ जाता है। उन्होंने इसे निरंकुश आचरण की पराकाष्ठा बताया।















