नई दिल्ली, 23 अप्रैल।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज एक संस्कृत सुभाषित के माध्यम से समाज में निःस्वार्थ सेवा और परोपकार के महत्व को उजागर किया। उन्होंने इस श्लोक को सोशल मीडिया पर साझा करते हुए समाज में बिना किसी व्यक्तिगत अपेक्षा के दूसरों की भलाई में काम करने की प्रेरणा दी।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा साझा किया गया सुभाषित इस प्रकार है: "पद्माकरं दिनकरो विकचीकरोति चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवालम्। नाभ्यर्थितो जलधरोऽपि जलं ददाति सन्तः स्वयं परहितेषु कृताभियोगाः।।" इसका अर्थ है कि जैसे सूर्य कमल को खिलाता है, चंद्रमा कुमुदिनी को विकसित करता है और बादल बिना मांगे वर्षा करते हैं, ठीक उसी तरह सज्जन व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के दूसरों के भले के लिए कार्य करते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने इस श्लोक के माध्यम से समाज में परोपकार, करुणा और निःस्वार्थ सेवा के मूल्यों को सशक्त रूप से प्रस्तुत किया और नागरिकों से इन उच्चतम मानविक गुणों को अपने जीवन में अपनाने का आह्वान किया। उनके इस संदेश ने समाज में दयालुता, सहानुभूति और परहित की भावना को प्रोत्साहित करने का कार्य किया है।










.jpg)
