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10 Jun, 2026

विश्व नेत्रदान दिवस पर मानवता का संदेश, मृत्यु के बाद भी दो जीवन में प्रकाश देने का संकल्प

विश्व नेत्रदान दिवस पर नेत्रदान को मानवता, सेवा और जागरूकता का प्रतीक बताते हुए इसके महत्व, प्रक्रिया, वैज्ञानिक उपयोग और सामाजिक योगदान को रेखांकित किया गया।

भोपाल, 10 जून।

विश्व नेत्रदान दिवस के अवसर पर मानवता, करुणा और परोपकार के महत्व को रेखांकित करते हुए यह संदेश दिया गया है कि व्यक्ति का वास्तविक जीवन मूल्य केवल अपने लिए जीने में नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन को प्रकाशमान बनाने में निहित है। नेत्रदान को मानवता की सर्वोच्च सेवा का प्रतीक बताते हुए इसे मृत्यु के बाद भी जीवन को सार्थक करने वाला अमर संकल्प कहा गया है।

दृष्टि को जीवन का आधार बताते हुए उल्लेख किया गया कि यह केवल देखने का माध्यम नहीं, बल्कि ज्ञान, आत्मनिर्भरता और अनुभव का द्वार है। कॉर्निया क्षतिग्रस्त होने पर व्यक्ति दृष्टिहीन हो सकता है, जबकि किसी दिवंगत व्यक्ति द्वारा दान किया गया कॉर्निया किसी जरूरतमंद को पुनः दृष्टि प्रदान कर सकता है।

प्रत्येक वर्ष 10 जून को मनाया जाने वाला यह दिवस समाज में नेत्रदान के प्रति जागरूकता फैलाने और भ्रांतियों को दूर करने का अवसर प्रदान करता है। इसका उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि मृत्यु के बाद भी व्यक्ति अपने नेत्रों के माध्यम से दो लोगों के जीवन में प्रकाश भर सकता है।

नेत्रदान की प्रक्रिया को सरल और वैज्ञानिक बताते हुए कहा गया कि इसमें मृत्यु के बाद कॉर्निया को सुरक्षित रूप से निकालकर प्रत्यारोपण के लिए उपयोग किया जाता है, जिससे शरीर या अंतिम संस्कार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

ऐतिहासिक रूप से वर्ष 1905 में पहले सफल कॉर्निया प्रत्यारोपण के बाद इस क्षेत्र में निरंतर प्रगति हुई और भारत में नेत्र बैंक नेटवर्क के विस्तार के साथ यह सेवा मजबूत हुई।

दृष्टिबाधिता को गंभीर समस्या बताते हुए कहा गया कि भारत सहित विश्वभर में लाखों लोग कॉर्निया संबंधी रोगों के कारण प्रभावित हैं और प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा में हैं, जबकि उपलब्ध कॉर्निया की संख्या आवश्यकता से कम है।

नेत्रदान को चिकित्सा के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारी बताते हुए इसके वैज्ञानिक महत्व को रेखांकित किया गया, जिससे दृष्टि वापस मिलने पर व्यक्ति शिक्षा, रोजगार और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ सकता है।

समाज में फैली भ्रांतियों जैसे आयु, चश्मा, धार्मिक मान्यताएं और शरीर पर प्रभाव को गलत बताते हुए स्पष्ट किया गया कि नेत्रदान एक सुरक्षित और सम्मानजनक प्रक्रिया है।

भारतीय संस्कृति में दान को सर्वोच्च स्थान देते हुए नेत्रदान को आधुनिक युग का महादान बताया गया, जो मानवता और सेवा की परंपरा को आगे बढ़ाता है।

नेत्रदान की प्रक्रिया में संकल्प, परिवार की सहमति, सूचना और समयबद्ध कॉर्निया प्राप्ति को महत्वपूर्ण बताया गया, जो मृत्यु के कुछ घंटों के भीतर संपन्न होती है।

इस अवसर पर यह भी कहा गया कि यदि समाज में जागरूकता बढ़े तो नेत्रदान को व्यापक जनआंदोलन बनाया जा सकता है, जिससे लाखों दृष्टिबाधित लोगों के जीवन में उजाला लाया जा सके।

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