बेंगलुरु, 14 जून।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने चंद्रमा पर अपने भविष्य के अभियानों को और अधिक मजबूती देने के लिए परमाणु ऊर्जा विभाग के साथ एक महत्वपूर्ण समझौता किया है। इसरो के अध्यक्ष वी. नारायणन ने बताया कि दोनों संस्थान मिलकर एक अत्याधुनिक 'आर्टिफिशियल हीटिंग सिस्टम' विकसित कर रहे हैं।
इस तकनीक का मुख्य उद्देश्य चंद्रमा पर लैंडर को वहां की भीषण ठंड से बचाना है। इसरो प्रमुख ने बेंगलुरु में आयोजित एक कार्यक्रम में स्पष्ट किया कि चंद्रयान-3 का 'विक्रम' लैंडर सौर ऊर्जा पर आधारित था, इसलिए वह केवल 14 दिनों तक ही कार्य कर सका। अब नए सहयोग से ऐसा लैंडर तैयार होगा जो लगभग 200 दिनों तक चंद्रमा की कठिन परिस्थितियों में जीवित रह सकेगा।
चंद्रमा पर दिन और रात की अवधि पृथ्वी के 14-14 दिनों के बराबर होती है। वहां का तापमान दिन में 121 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, तो रात में यह माइनस 129 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। कृत्रिम हीटर से लैस नया लैंडर इस तापमान को झेलने में सक्षम होगा, जिससे लंबे समय तक अंतरिक्ष अन्वेषण संभव हो पाएगा।
इसरो और वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) ने तकनीकी सहयोग के लिए 40 क्षेत्र चिन्हित किए हैं, जिनमें से 17 को पहले चरण में मंजूरी मिल चुकी है। इसके अलावा गगनयान मिशन के लिए 'स्पेस मेडिसिन' और सूक्ष्म-गुरुत्वाकर्षण प्रयोगों के लिए जैव प्रौद्योगिकी विभाग के साथ भी कार्य किया जा रहा है।








