मध्य प्रदेश
23 Jun, 2026

बुंदेली मार्शल आर्ट के ‘दाऊ’ को मरणोपरांत पद्मश्री

सागर के स्वर्गीय भगवान दास रैकवार को बुंदेली मार्शल आर्ट और अखाड़ा परंपरा के संरक्षण में उनके अमूल्य योगदान के लिए मरणोपरांत पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया।

नई दिल्ली, 23 जून।

सागर जिले के स्वर्गीय भगवान दास रैकवार को देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों में शामिल पद्मश्री सम्मान से मरणोपरांत अलंकृत किया गया है। मंगलवार को राष्ट्रपति भवन में आयोजित सम्मान समारोह में खेल श्रेणी के अंतर्गत बुंदेली मार्शल आर्ट के संरक्षण और संवर्धन में उनके उल्लेखनीय योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके पुत्र राजकुमार रैकवार ने ग्रहण किया।

सागर निवासी भगवान दास रैकवार, जिन्हें लोग स्नेहपूर्वक ‘दाऊ’ के नाम से जानते थे, ने अपना पूरा जीवन पारंपरिक बुंदेली अखाड़ा संस्कृति और लोक कलाओं को जीवित रखने के लिए समर्पित कर दिया। ऐसे समय में जब बुंदेलखंड की पारंपरिक युद्ध कला धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रही थी, उन्होंने इसे नई पहचान दिलाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

उन्होंने लाठी चलाने की कला, तलवारबाजी और आत्मरक्षा से जुड़े पारंपरिक बुंदेली कौशलों को संरक्षित करने के साथ उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाने का निरंतर प्रयास किया। उनके प्रयासों से यह प्राचीन कला न केवल सुरक्षित रही, बल्कि युवाओं के बीच भी लोकप्रिय होती गई।

दाऊ एक कुशल प्रशिक्षक और मार्गदर्शक के रूप में भी पहचान रखते थे। उन्होंने सागर और आसपास के क्षेत्रों में हजारों बच्चों और युवाओं को प्रशिक्षण दिया। उनके शिष्यों ने विभिन्न मंचों पर बुंदेली संस्कृति और अखाड़ा परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हुए उल्लेखनीय पहचान बनाई। उनका मानना था कि पारंपरिक कलाएं युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के साथ अनुशासन और आत्मविश्वास भी प्रदान करती हैं।

राष्ट्रपति भवन में जैसे ही भगवान दास रैकवार के नाम की घोषणा हुई, सागर सहित पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई। बुंदेली संस्कृति से जुड़े लोगों और कला प्रेमियों ने इसे क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत के सम्मान के रूप में देखा। लोगों का कहना है कि यह उपलब्धि केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरी अखाड़ा परंपरा और बुंदेली लोक संस्कृति के गौरव का प्रतीक है।

सम्मान ग्रहण करने के बाद उनके पुत्र राजकुमार रैकवार ने कहा कि यह पुरस्कार उनके पिता की वर्षों की साधना और समर्पण का परिणाम है। उन्होंने कहा कि जिस कला को संरक्षित रखने के लिए उनके पिता ने अपना जीवन समर्पित किया, उसे आज राष्ट्रीय पहचान मिली है और परिवार इस विरासत को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध रहेगा।

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