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25 Jun, 2026

भोपाल में ई-एफआईआर व्यवस्था पर उठे सवाल, 1612 आवेदन भी नहीं बदल सके तस्वीर

भोपाल में दो वर्षों के दौरान 1612 ई-एफआईआर आवेदन आने के बावजूद सत्यापन प्रक्रिया, सीमित दायरा और तकनीकी बाधाओं के कारण ऑनलाइन एफआईआर व्यवस्था अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी।

भोपाल, 25 जून।

राजधानी भोपाल में नागरिकों को घर बैठे ई-एफआईआर दर्ज कराने की सुविधा देने का दावा अब तक अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका है। पुलिस कमिश्नरेट के 38 थानों में वर्ष 2024 और 2025 के दौरान कुल 1612 ऑनलाइन आवेदन प्राप्त हुए, लेकिन बड़ी संख्या में शिकायतें शुरुआती प्रक्रिया में ही अटक गईं। डिजिटल व्यवस्था लागू होने के बावजूद आवेदकों को सत्यापन के लिए थानों तक जाना पड़ रहा है, जिससे इसकी उपयोगिता पर सवाल उठ रहे हैं।

पुलिस के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 में 830 और वर्ष 2025 में 782 ई-एफआईआर आवेदन दर्ज हुए। हालांकि इनमें से कितने मामलों में वास्तविक एफआईआर दर्ज की गई, इसका विस्तृत ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया गया है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि कई आवेदक तय समय सीमा के भीतर दस्तावेजों का सत्यापन नहीं करा पाते, जिसके कारण आवेदन स्वतः निरस्त हो जाते हैं।

वर्तमान व्यवस्था के तहत ऑनलाइन शिकायत दर्ज करने के बाद आवेदक को तीन दिन के भीतर संबंधित थाने पहुंचकर पहचान और दस्तावेजों का सत्यापन कराना अनिवार्य है। यदि 30 दिनों के भीतर यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तो आवेदन स्वतः समाप्त माना जाता है। यही नियम अधिकांश शिकायतकर्ताओं के लिए सबसे बड़ी परेशानी बनकर सामने आया है। लोगों का कहना है कि जब अंततः थाने जाना ही पड़ता है, तो ऑनलाइन सुविधा का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। कई बार जानकारी के अभाव में निर्धारित समय सीमा भी निकल जाती है।

सूत्रों के अनुसार कई थानों में ऑनलाइन शिकायतों की नियमित निगरानी नहीं हो रही है। स्टाफ की कमी, तकनीकी प्रशिक्षण का अभाव और पारंपरिक कार्यशैली के कारण डिजिटल माध्यम से दर्ज शिकायतों को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिल पा रही है। इससे कई आवेदन कार्रवाई की प्रतीक्षा में लंबित रह जाते हैं। जानकारों का मानना है कि प्रत्येक थाने में ई-एफआईआर के लिए जवाबदेह नोडल अधिकारी नियुक्त किए बिना इस व्यवस्था का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकेगा।

यह सुविधा महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों और तकनीक का उपयोग करने वाले लोगों के लिए अधिक उपयोगी मानी गई थी, लेकिन उपलब्ध आंकड़े इसकी सीमित पहुंच की ओर इशारा करते हैं। वर्ष 2025 में केवल एक महिला और 102 वरिष्ठ नागरिकों ने ई-एफआईआर का उपयोग किया। विशेषज्ञों के अनुसार जागरूकता की कमी और जटिल प्रक्रिया इसके प्रमुख कारण हैं।

फिलहाल ई-एफआईआर केवल उन मामलों में दर्ज की जा सकती है, जिनमें अधिकतम तीन वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। चोरी, गुमशुदगी और कुछ सीमित श्रेणी के अपराध ही इसके दायरे में आते हैं। गंभीर मामलों में शिकायतकर्ता को सीधे थाने जाकर रिपोर्ट दर्ज करानी पड़ती है। इसी वजह से बड़ी संख्या में लोग इसे अधूरी डिजिटल सेवा मानते हैं।

विशेषज्ञों और नागरिकों ने व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कई सुझाव दिए हैं। इनमें वीडियो कॉल के माध्यम से ऑनलाइन सत्यापन, ई-साइन और डिजिटल दस्तावेज प्रमाणीकरण को मान्यता, ई-एफआईआर के निपटान को थानेदारों के प्रदर्शन मूल्यांकन से जोड़ना, पंचायतों, स्कूलों, कॉलेजों और सोशल मीडिया के जरिए जागरूकता अभियान चलाना तथा गंभीर अपराधों में भी ई-जीरो एफआईआर की सुविधा का विस्तार शामिल है।

डिजिटल इंडिया और स्मार्ट पुलिसिंग के दौर में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि ऑनलाइन आवेदन के बाद भी शिकायतकर्ता को थाने के चक्कर लगाने पड़ें, तो ई-एफआईआर और पारंपरिक एफआईआर के बीच अंतर कितना रह जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक यह व्यवस्था पूरी तरह नागरिक-अनुकूल नहीं बनेगी, तब तक घर बैठे एफआईआर दर्ज कराने का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा।

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