रांची, 24 जुलाई।
झारखंड उच्च न्यायालय ने हजारीबाग जिले के केरेडारी क्षेत्र से जुड़े एक बड़े मामले में अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि लंबे अर्से से चली आ रही जमाबंदी को केवल प्रशासनिक आदेश के जरिए रद्द नहीं किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि यदि सरकार को किसी भी भूमि बंदोबस्ती की वैधता पर कोई संदेह है, तो उसे अपने स्वामित्व के निर्धारण के वास्ते सक्षम सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाना होगा।
न्यायमूर्ति आनंद सेन की बेंच ने मोहम्मद जाहिद और मोहम्मद शमीम की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए हजारीबाग के तत्कालीन उपायुक्त द्वारा पारित जमाबंदी निरस्तीकरण के आदेश को खारिज कर दिया है। याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने कोर्ट में यह पक्ष रखा था कि संबंधित भूमि का बंदोबस्त पुराने समय में जमींदार द्वारा किया गया था और वर्ष 1955 से लगातार उनके नाम पर जमाबंदी चली आ रही है तथा वे नियमित रूप से लगान भी भर रहे हैं।
इसके विपरीत राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया था कि बंदोबस्ती संदिग्ध है क्योंकि उस वक्त याचिकाकर्ताओं की उम्र बहुत कम थी और मूल अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि केवल रजिस्टर में प्रविष्टि न होने या अन्य संदेहों के आधार पर लगभग 60 साल पुरानी जमाबंदी को समाप्त नहीं किया जा सकता है, और सरकार को सिविल कोर्ट में जाने की स्वतंत्रता दी गई है।










