ग्वालियर, 25 जुलाई।
हर वर्ष परीक्षा परिणाम घोषित होते ही एक ही प्रश्न पूरे समाज में गूंजने लगता है— "और कितने प्रतिशत आए?" यही प्रश्न मानो किसी विद्यार्थी की क्षमता, भविष्य और व्यक्तित्व का अंतिम निर्णय बन जाता है। लेकिन इस शोर के बीच एक महत्वपूर्ण प्रश्न कहीं खो जाता है— "उस बच्चे ने वास्तव में क्या सीखा?"
यही है शिक्षा और परीक्षा के बीच का अंतर, जिसे स्पष्ट रूप से समझना आवश्यक है। शिक्षा का उद्देश्य कभी भी अंक अर्जित करना नहीं था। उसका उद्देश्य है जिज्ञासा जगाना, सोचने की क्षमता विकसित करना, सही-गलत का विवेक देना और ऐसे नागरिक तैयार करना जो समस्या का बेहतर ढंग से समाधान कर सकें। दुर्भाग्य से आज शिक्षा का बड़ा हिस्सा अंकों की प्रतिस्पर्धा में सिमटता जा रहा है। विद्यार्थी विषय को समझने से अधिक उसे परीक्षा में लिखने योग्य बनाने की तैयारी में लगे रहते हैं, और उससे भी अधिक शिक्षक तथा अभिभावक रचनात्मक सीखने पर अनजाने में केवल एक रणनीति बना चुके हैं।
यह कहना गलत होगा कि स्कोर महत्वहीन हैं। स्कोर आवश्यक हैं, क्योंकि वे किसी स्तर तक उपलब्धि का संकेत देते हैं। लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब हम स्कोर को ही सीखने का पर्याय मान लेते हैं। एक रिपोर्ट किसी विद्यार्थी की स्थिति बता सकती है, पर उसकी रचनात्मकता, नेतृत्व क्षमता, संवेदनशीलता या जीवन की चुनौतियों से जूझने की योग्यता को कैसे माप सकती है?
आज का समय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा विज्ञान जैसे तीव्र परिवर्तन का समय है। जानकारी अब पुस्तकों तक सीमित नहीं है; वह हर मोबाइल फ़ोन में कुछ ही सेकंड में उपलब्ध हो जाती है। ऐसे में शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य तथ्यों को याद करना नहीं, बल्कि यह सिखाना होना चाहिए कि जानकारी का सही उपयोग कैसे किया जाए, सही निर्णय कैसे लिए जाएँ और नई परिस्थितियों में ज्ञान का उपयोग कैसे किया जाए।
यदि बच्चों से केवल यह उम्मीद की जाए कि वे जितना पढ़ें, उतना ही लिखें, तो हम सीखने की प्रक्रिया को पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित कर देंगे। जबकि शिक्षा तब होती है, जब विद्यार्थी किसी प्रश्न पर विचार करता है, प्रयोग करता है, असफल होता है, फिर सीखता है और अपने अनुभवों से नए अर्थ गढ़ता है। सीखना एक जीवंत प्रक्रिया है, जबकि परीक्षा उसका केवल एक क्षणिक चित्र है।
इसी संदर्भ में लर्निंग एनालिटिक्स और डेटा विज्ञान शिक्षा के लिए नई संभावनाएँ लेकर आए हैं। यदि इनका उपयोग केवल मूल्यांकन के लिए न किया जाए, तो ये शिक्षक यह समझ सकते हैं कि कौन-सा विद्यार्थी किस अवधारणा में कठिनाई महसूस कर रहा है, किसे अतिरिक्त सहयोग की आवश्यकता है और किस प्रकार की शिक्षण-प्रक्रिया उसके लिए अधिक प्रभावी होगी। डेटा का उद्देश्य विद्यार्थियों को अंक देना नहीं, बल्कि उनके सीखने की यात्रा को समझना होना चाहिए। लेकिन तकनीक भी तभी सार्थक है, जब उसके केंद्र में मनुष्य हो। शिक्षा केवल एल्गोरिदम से नहीं चलती; वह शिक्षक की संवेदना, विद्यार्थी की जिज्ञासा और सीखने के वातावरण से निर्मित होती है। यदि इसे केवल आँकड़ों तक सीमित कर दिया जाए, तो वह केवल आँकड़ा बनकर रह जाएगी।
इस दृष्टिकोण से नई शिक्षा नीति भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। शिक्षकों को भी यह याद रखना होगा कि प्रत्येक बच्चा एक व्यक्ति है और बताइए, कितने अंक आए? का प्रश्न ही उसकी पहचान नहीं हो सकता। यदि हमारी शिक्षा व्यवस्था रिपोर्ट कार्ड की सीमाओं से आगे नहीं बढ़ेगी, तो हम ऐसे नागरिक तैयार करेंगे जो परीक्षा तो पास कर लेंगे, लेकिन जीवन की चुनौतियों का सामना करने में कठिनाई अनुभव करेंगे। क्या यह समय नहीं आ गया है कि हम अपने बच्चों से यह पूछें— "तुमने कितना सीखा?" न कि केवल "तुम्हें कितने अंक मिले?"
राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी समग्र विकास, कौशल-आधारित शिक्षा और अनुभवात्मक अधिगम पर बल देती है। अब चुनौती नीति बनाने की नहीं, बल्कि उसे अपने विद्यालयों और कक्षाओं में प्रभावी रूप से लागू करने की है। यदि सफलता को केवल प्रतिशत में मापा जाएगा, तो सच्चा सीखना उसी अनुपात में पीछे छूटता जाएगा।
समय आ गया है कि हम शिक्षा की सफलता को अंकों से नहीं, सीखने की गहराई से मापें। क्योंकि अंक यह बता सकते हैं कि विद्यार्थी ने परीक्षा में कैसा प्रदर्शन किया, लेकिन वे यह नहीं बता सकते कि उसने जीवन के लिए कितना सीखा।
शायद अब हमें अपने बच्चों से यह पूछना शुरू करना चाहिए— "तुमने कितना सीखा?" न कि केवल "तुम्हें कितने अंक मिले?" क्योंकि अंततः शिक्षा का उद्देश्य अच्छे अंक लाना नहीं, बल्कि अच्छे विचार, बेहतर निर्णय और अच्छा मनुष्य बनाना है।
-डॉ. दीप्ति यादव













